बनास पर सूर्यास्त

बरसों से

जो सारे अव्यक्त अफ़सोसों और कृतज्ञताओं को लिए बह रही है

थोड़ा-बहुत उस नदी को जानता हूँ

किनारे पर यथावत् खड़ी हैं कांटेदार झाडि़याँ

और हल्की नमी है कहीं-कहीं रेत में

इसका जल रोज सूर्योदय पर केसरिया हो जाता है

लाल सुखऱ् कर डालता है सूर्यास्त उसकी देह को

दोपहर भर उसकी अदृश्य भाप चिलचिलाते

आकाश की तरफ़ उड़ती है

रात में बनास बहुत भयावह दिखती है जब भाद्रपद का

अँधेरा उस पर किसी छा जाता है प्रेत-बाधा की तरह

और उफनते हुए जल की आवाज़ बार-बार निर्जन पहाड़ों से टकराती है

तब उसके पास जाने की कल्पना मात्र से रोंगटे खड़े होने लगते हैं

बालू में इसी बनास की अनगिनत ख़रबूजे उगाते हैं यहाँ के कीर

उनकी कच्ची टपरियों में चमकते हैं रात को लालटेनों के जुगनूँ

इनके पेट से दिन भर बजरी खोदते दिखते हैं मज़दूर

बजरी के ठेकेदार और ट्रक-ड्राइवर उन्हें

जल्दी-जल्दी हाथ न चला पाने के लिए फौश गालियाँ देते हैं

बनास गूँगी बहरी उन्हें कभी नहीं सुनती

न पलट कर जवाब देती है कभी

पसीने से लथपथ वे मज़दूर अभ्रक के चमकीले

बारीक कणों वाली बजरी से नहा कर लौटते हैं घर हर सूर्यास्त पर

नहीं जानती बनास उन्हें क्यों नहीं लुभाते

तट पर उगे खजूर के लगातार पेड़

किनारे के गोल-चिकने पत्थर

सुस्ताती हुई पुरानी नांवों के सुन्दर आकार

यह नदी एक दिनचर्या है

सवेरे सैर करने वाले पेंशनया़ता बूढ़ों की

एक सुविधा, छिप कर अवैध प्रेम करने वालों के लिए

मजूरों के लिए पेट भरने का सामान

शाम की धुँधुआती रोशनी में वे कामगार

बजती हुई साइकिलों पर शहर की तरफ़

लौट रहे हैं थकान चूर से और

सूर्यास्त के सौन्दर्य से बेख़बर

बनास की किस उदारता के लिए वे

नतमस्तक हैं

यह भी नहीं जानती क्या

यह क्रूर, ख़ूबसूरत,

गूँगी, बहरी, बनास नदी ?

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