जन्मदिवस

यहाँ तक आ रही है जिस रोशनी की मन्दी-सी ऊष्मा

उसमें मैं अवश्य खड़ा मिलूँगा

अपने-आपको बहुत से जन्मदिवसों के बाद

खुली होंगी किताबें सिरहाने और नदियाँ लगातार बह रही होंगी

बच्चों नावों खिड़कियों के इन्तज़ार में डूबे हुए देखूँगा ख़ुद को पैदल चलते धूप में

अपने सबसे प्रिय सबसे व्याकुल दिनों के लिए चढ़ते हुए साइकिल पर पिघल जाऊँगा

प्रथम प्रेम की व्यतीत दोपहरी में किसी याद के भीतर रेल की पटरियों पर

जिन झाडि़यों की परछाइयाँ खा रही होंगी पछाड़ें उनकी व्यथा और उनके आनन्द में

मैं फिर जन्म लेना चाहूँगा एक नीली शान्त मृत्यु में

काँपता होगा जिस पल दिन के उजास का आखि़री धब्बा

आल्हाद और व्यग्रता में देखूँगा अपने यौवन को अपराजित

जिसे हारना चाहूँगा पहली और आखि़री बार

एक थकी हुई किसी एक अनजान गुमसुम वर्षगाँठ से

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