जो कुछ सुन्दर था, प्रेम, काम्य

जो कुछ सुन्दर था, प्रेय, काम्य,
जो अच्छा, मँजा नया था, सत्य-सार,
मैं बीन-बीन कर लाया
नैवेद्य चढ़ाया ।
पर यह क्या हुआ ?
सब पड़ा-पड़ा कुम्हलाया, सूख गया मुरझाया :
कुछ भी तो उसने हाथ बढ़ा कर नहीं लिया ।

गोपन लज्जा में लिपटा, सहमा स्वर भीतर से आया :
यह सब मन ने किया,
हृदय ने कुछ नहीं दिया,
थाती का नहीं, अपना हो जिया ।
इस लिए आत्मा ने कुछ नहीं छुआ ।

केवल जो अस्पृश्य, गर्ह्य कह
तज आई मेरे अस्तित्त्व मात्र की सत्ता,
जिस के भय से त्रस्त, ओढ़ती काली घृणा इयत्ता,
उतना ही, वही हलाहल उस ने लिया ।
और मुझ को वात्सल्य-भरा आशिष दे कर-
ओक भर पिया ।

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