विश्वास मेरा तब जाग उठा

एक दिन मै सुबह घर से निकला,हाल जानने मौसम का
वर्षा की उम्मीद न थी कोई ,प्रकोप छाया था गर्मी का |१|

लेकिन बस मन ही मन में ,विश्वास मेरा तब जाग उठा
और विस्वास पर संकल्प किये,मै तत्पर चल दिया कदम बढ़ा |२|

शायद आज बादल ही बरसे,हम कितने वर्षा बिन तरसे
कड़ी धूप से बेहाल सभी थे,बादल से उम्मीद लगाए |३|

देखो अब बादल बरसेंगे,जंगल शायद अब हर्षेंगे
हरयाली चन्हूओर दिखेगी,खुशहाली चेहरों पे खिलेगी |४|

दो नैना- नभ को देख-२, मैंने लिख डाला एक लेख
देखो बादल का रंग-रूप,खूब सताए सूरज की धूप |५|

सफ़र में सूखा मेरा गला,यहाँ पानी देगा कौन भला
सूखे-सफ़ेद बादल चले, तब मै भी बन बादल चला |६|

न बादल में ही पानी था, न राह में मेरी पानी था
बादल जैसा था मेरा हाल,बिगड़ी हुई थी मौसम की चाल |७|

कंही धूप दिखे कंही छाया दिखे,कैसी कुदरत की माया दिखे
सुबह से दोपहर हो गई,पानी आश में प्यास खो गई |८ |

मन में थी बस एक उमंग,कि आज मै नहाऊं वर्षा के संग
लेकिन ऐसा हो न सका था,सूरज भी तब ढलने चला था |९|

दिल की तमन्ना दिल में ही थी,सूखे होंठ प्यासी त्रस्त आत्मा थी
नजरें उठी मेरी आसमां की ओर, देखा स्याह बादल था घनघोर |१०|

पुन: नजरें मैंने तुरंत घुमाई,धीमे-२ काले बादलों ने की अगुआई
हवा ने बजाई सहनाईयां,घटा-घुप्पड देने लगी बधाईयाँ |११|

खड़ा वृक्ष के निचे मै तब,देख रहा था अजब नजारा
आसमां में गजब सी हरकत,होता दिखता अँधियारा |१२|

बिजली केमरा लेकर आई,छाया चित्र ले शरमाई
घड-घड-घड-घड जो आवाज थी आई,पटाखे सी बिजली चिल्लाई |१३|

देख रहा था मै वो लड़ाई,बिजली से बिजली टकराई
मन ही मन सोचा मैंने भाई,न जाने किसकी सामत आई |१४|

मेघों ने धरती पर हलकी-२, ठंडी-२ नन्ही बूंदें बरसाई
बूँदें दो- चार पड़ी जो तन पर,याद प्यास की तत्पर आई |१५|

पुन:विस्वास पैदा हुआ,चल पानी को खोज चला-चल
वर्षा रिम झिम तेज हो चली, मिला न मुझे पीने का जल |१६|

मंजिल दिखती दूर नहीं थी,पहचान गौर से तब मैंने की थी
दिखा मंदिर की चोटी पर झंडा,मौसम हो चला था ठंडा |१७|

पहुँच देवालय राहत पाई,मीठी कूक कोयल ने लगाई
वहां कुआँ देख मै रुक गया भाई, मैंने जल खींच कर प्यास बुझाई |१८|

पूर्ण संकल्प हुआ था मेरा, घर लौटना अपूर्ण था मेरा
लौटने लगा मै घर के रस्ते, मेघों को देखा खूब बरसते |१९|

अभी दिन ढालना था बाकी,पंक्षियों की निकली थी झांकी
मन्त्र-मुग्ध था मेरा मन, बेशक गीला था मेरा तन |२०|

वर्षा की झम-झम थमी थी, कुछ समय से पवन भी रुकी थी
हलकी-२ स्याह बदली दूर तक छाई,और गुलाबी संध्या होने को आई |२१|

सूरज नहीं ढला था जब तक,प्रकृति रंगों ने दी अपनी दस्तक
इंद्रधनुष सतरंगी बना,सोंदर्य उसका लुभा रहा |२२|

भाव विभोर हो उठा मेरा मन,चंचल-चकित जैसे थे वो क्षण
प्रस्थान जारी था सबका,आधा सूर्य डूब गया था |२३|

मै भी घर को लौट रहा था,पंक्षी भी घर को लौट रहे थे
चिड़ियों की चहचाहट से,झींगुरों की झुन-२ से |२४|

ज्ञात हुआ मुझे हो गई शाम, कर्तव्य से लौटने-लगे अव-आम
मौसम की वो शाम भली थी,संध्या रति से गले मिली थी |२५|

देख ये सब चंदा मुश्काए,ख़ुशी से तारे भी टिम-टिमाए
पुन:गड-गड बादल गुराते, निशाचर दिखे भोज उड़ाते |२६|

अच्छा उस दिन व्रत पड़ गया,सच्चा मेरा व्रत हो गया
पहुँच गया मै अपने घर तक,पुन:बूंदों की होने लगी टप-२ |२७|

मौसम देख मै खूब हर्साया,वर्षा संग मै खूब नहाया
एक दिन का मौसम भाया,लगता था जेसे सावन आया |२८|

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