कीर्तन करते हंस

न जाने किस के लिए गा रहे हैं वे

अलस्सुबह पपड़ाते हुए तालाब में अकेले और एक साथ

कच्छ के पचासों हंस

खड़ा हूँ पाल पर जैसे पृथ्वी पर कोई अज्ञात अंतरिक्ष-यात्री

हो रही धूमिल आकाश-रेखा जामनगर के शहर की

कीर्तन में डूबे लोग नहीं देखते हंस

हंसों को भी नहीं सुहाती विश्व की सबसे लम्बी रामधुन

ताल के बचे हुए जरा से पानी में वे बरसों से खड़े हैं

अनजाने श्रोताओं को अपना संगीत सुनाते

नहीं, यह महज एक दृश्य नहीं

उड़ते हुए जल जान बचाती मछलियों

और हंसों की जिजीविषा का वृन्दगान है।

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