ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं

ग़ज़ब है सुरमः देकर आज वह बाहर निकलते हैं ।
अभी से कुछ दिल मुज़्तर[1] पर अपने तीर चलते हैं ।

ज़रा देखो तो ऐ अहले सखुन[2] ज़ोरे सनाअत[3] को ।
नई बंदिश है मजमूँ नूर के साँचें में ढलते हैं ।

बुरा हो इश्क का यह हाल है अब तेरी फ़ुर्कत[4] में ।
कि चश्मे खूँ चकाँ[5] से लख़्ते[6] दिल पैहम[7] निकलते हैं ।

हिला देंगे अभी हे संगे दिल तेरे कलेजे को ।
हमारी आहे आतिश-बार[8] से पत्थर पिघलते हैं ।

तेरा उभरा हुआ सीना जो हमको याद आता है ।
तो ऐ रश्के परी पहरों कफ़े[9] अफ़सोस मलते हैं ।

किसी पहलू नहीं चैन आता है उश्शाक[10] को तेरे ।
तड़फते हैं फ़ुगाँ[11] करते हैं औ करवट बदलते हैं ।

‘रसा’ हाजत[12] नहीं कुछ रौशनी की कुंजे मर्कद[13] में ।
बजाये शमा याँ दागे जिगर हर वक़्त जलते हैं ।

शब्दार्थ:

  1. ↑ घबराए हुए
  2. ↑ कविगण
  3. ↑ व्यंजना
  4. ↑ विरह
  5. ↑ टपकने वाला
  6. ↑ टुकड़ा
  7. ↑ सदा
  8. ↑ अग्निवर्षक
  9. ↑ हथेली
  10. ↑ आशिकों
  11. ↑ रोना-चिल्लाना
  12. ↑ ज़रूरत
  13. ↑ क़ब्र

2 Comments

    • admin चन्द्र भूषण सिंह 31/12/2012

Leave a Reply