फिर आई फस्ले गुल फिर जख़्मदह रह-रह के पकते हैं

फिर आई फ़स्ले[1] गुल[2] फिर जख़्मदह[3] रह-रह के पकते हैं ।
मेरे दागे जिगर[4] पर सूरते लाला[5] लहकते हैं ।

नसीहत है अबस[6] नासेह[7] बयाँ नाहक ही बकते हैं ।
जो बहके दुख्तेरज[8] से हैं वह कब इनसे बहकते हैं ?

कोई जाकर कहो ये आख़िरी पैगाम[9] उस बुत से ।
अरे आ जा अभी दम तन में बाक़ी है सिसकते हैं ।

न बोसा लेने देते हैं न लगते हैं गले मेरे ।
अभी कम-उम्र हैं हर बात पर मुझ से झिझकते हैं ।

व गैरों को अदा से कत्ल जब बेबाक[10] करते हैं ।
तो उसकी तेग़ को हम आह किस हैरत[11] से तकते हैं ।

उड़ा लाए हो यह तर्जे सखुन[12] किस से बताओ तो ।
दमे तक़दीर[13] गोया बाग़ में बुलबुल चहकते हैं ।

‘रसा’ की है तलाशे यार में यह दश्त-पैमाई[14] ।
कि मिस्ले शीशा मेरे पाँव के छाले झलकते हैं ।

शब्दार्थ:

  1. ↑ ऋतु
  2. ↑ फूल
  3. ↑ घाव
  4. ↑ हृदय
  5. ↑ एक पुष्प
  6. ↑ व्यर्थ
  7. ↑ उपदेशक
  8. ↑ मदिरा
  9. ↑ संदेश
  10. ↑ निडरतापूर्वक
  11. ↑ आश्चर्य
  12. ↑ कहने की शैली
  13. ↑ बोलना
  14. ↑ जंगल में भटकना

3 Comments

  1. yashoda agrawal 14/06/2012
  2. Sushilashivran 16/06/2012
  3. sada 16/06/2012

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