बुनियाद जिसकी खोखली हो, वो मकान क्या होगी..

जो वादों से अपने मुकर जाए, वो जुबान क्या होगी.

बुनियाद जिसकी खोखली हो, वो मकान क्या होगी..

छाया तलक ना दे सके, वो वृक्ष है किस काम का.

दो बूंद को तरसे जमीं, वो आसमान क्या होगी..

फैला हुआ असमानता का जाल हो जिस देश में.

है सोचने की बात, वहाँ का संविधान क्या होगी..

हर फिक्र छोडकर के, सो जाता है ‘श्वेत’ जिस जगह.

माँ के आँचल के सिवा, कोई और जहान क्या होगी..

रावण भरे पडे हैं यहाँ, राम के मुखौटों में.

है ‘श्वेत’ सोच में पडा, विधि का विधान क्या होगी..

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