ठोकरें ज़माने की

ये सज़ा मिली मुझको तुमसे दिल लगाने की

मिल रही हें बस मुझको ठोकरें ज़माने की

 

फैसला हे ये मेरा मैं तुम्हें भुला दूंगा

तुमको भी इजाज़त हे मुझको भूल जाने की

 

ख़ाब अब मुहब्बत के मैं कभी न देखूँगा

ताब ही नहीं मुझमे फिर से ज़ख्म खाने की

 

रह गयी उदासी हीअब तो मेरे हिस्से में

अब वजह नहीं कोई मेरे मुस्कुराने की

 

वो चले गए लेकिन हम न कुछ भी कह पाए

दिल में रह गयी हसरत हाले दिल बताने की

7 Comments

  1. yashoda agrawal 14/06/2012
  2. Sushilashivran 16/06/2012
  3. sangeeta swarup 16/06/2012
  4. Yashwant Mathur 16/06/2012
  5. sada 16/06/2012
  6. Sri Prakash Dimri 16/06/2012
  7. Sri Prakash Dimri 16/06/2012

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