पृथ्वी पुत्र बन

द्वंद्व में जीता जगत
मैं और मेरा की रटन
राष्ट्र परराष्ट्र की संकुचित मानसिकता
अन्तरराष्ट्रीयता का नया भाई-चारा
करती कुठारघात
उस परमशक्ति के विशाल नीले कैनवास पर

आकश, धरती और समुद्र
सभी को हमनें दिया बाँट
अजब मानव की गजब कहानियाँ
भरा है संसार इनके दमन और संत्रास से
रोकता है हर कोई अपनी ही राह
बना छोटा सा घरौंदा अपने मानसिकता का
ठेका दुनिया को ठीक करने का

उजाड़ रहा अपनी अस्मिता की बुलंद इमारत
खरोच रहा अपने ही पाँख सलाइयों से
आँखें दी है प्रभु ने समदर्शियों के लिए
हम स्वयं ही काना बनने के लाघव प्रयत्न में हैं
परम्परा के नाम पर बाँट दिया संस्कृति को
मानव सभ्यता बनने से पहले
मिटा दिया मानव को
दोष हमें हो या उन्हें
दोनों ने किया दोषारोपण
किसी ने कुछ कम
किसी ने कुछ ज्यादा
मिला क्या
व्यर्थ का विवाद
हम बाँट रहे सूरज
धरती, चाँद, हवा, पानी
कहते सुना था इस देश की
उस देश की कहानी
मानवीय सभ्यता के विकास में

जिन तथ्यों और तर्कों के आधार पर
खड़े किए बड़े बहुमंजिले मकान
नींव में उनके नहीं है
मानवीय व्यवहार का आधार
कठघरे में
एक दूसरे को कर रहे हैं
खड़ा आमने-सामने
राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर,
यहोवा, ईशा, मुहम्मद को
बड़ा या छोटा दिखाने की होड़ में
भूल गये हम
इनके सब के अपने-अपने थे युग
सभी ने दिया एक ही पे्रम का संदेश
केवल हम ही हैं जो
उस दिए संदेश को
अलग-अलग भाव भूमि पर
ग्रहण करने का उद्योग नहीं कर रहे हैं
सभी के संदेश में संदेह का
एक छोटा सा छिद्र देख रहे हैं

अधर्म के पागलपन में
शब्द को
उन्माद का रस चखाकर
बाँट रहे जाति, देश, पंथ की राहें
क्या अनेकता में एकता का गीत
भवरों और कलियों के लिए था
क्या सर्वेभवन्तु सुखिन: का बोध वाक्य
धरती और जाति की सीमा में
हमारे और पराये के लिए अलग
रखता है अर्थ?
वयं पचाधिकंशतम् क्या
युद्ध का संदेश देता है?

उसने कहा
तुमने बन्द कर लिए हैं
अपने खिडक़ी दरवाजे
हमने कहा
तुम मीनारों से पुकारते हो किसे?
हमने कहा
रंगविरंगे फूल, तितलियों के पराग
सब के लिए हैं
तुमने कहा-
एक रंग का ही फूल काफी है
क्या यह प्रकृति को नहीं विध्वंश का संदेश?

किसी ने कहा ईश्वर-अल्लाह एक ही नाम
हमने कहा- यह व्यर्थ की कवायद है
असल में जब तक अलग हैं
हमारे देवरूप
हमारी इबादत का तरीका
फिर एक कैसे हो सकता है -अल्लाह-ईश्वर
किसी पागल ने कहा-
सभी रास्ते एक ही तरफ जाते हैं
उसने कहा- चौराहे पर खड़े हैं हम
कौन बताएगा रास्ता किधर जायगा?
कहाँ मिलते हैं चौराहों से निकले
यह मजहबी रास्ते?
देखा किसने है इन्हें
अनुमान से गढ़ते रहोगे कब तक
मिलन बिन्दु का यर्थाथ धरातल
खोकर आत्मीयता, स्नेह, मानवीय संवेदना

किसने कहा था-
संसार में मजहब फैलाना है?
किसने कहा था –
पद्मावती का सतीत्व हरना है?
किसने कहा था –
धरती में केवल एक ही फूल खिलेगा
एक ही इबादत का होगा तरीका
एक ही पुस्तक में भरा है सब ज्ञान
एक ही गुबंद के नीचे से मिलती है शांति?
सूली पर चढ़ा दिया क्यों उसे
जिसने प्यार की बात कही
आज उसके जाने के बाद भी
क्यों बार-बार उसे चढ़ाते सूली में
बदलकर सेवा के नाम पर मजहब किसी का

उसने कहा-
मैंने नहीं छीना किसी की मान्यता
किसी का मजहब
हमने कहा-सीया राम मय सब जग जानी
-सर्व खल्विदं ब्रह्म
किन्तु प्रश्र यह नहीं कि
वह सही कि हम सही
प्रश्र यह है कि हमने भी अपनी जिद में
मानव को दुत्कारा है
बाँटा है मजहब में
राष्ट्र में
धर्म में
मान्यताओं में
हँसना, रोना भी बाँटा है
पागलपन के इस दौर में
कहाँ तक हम जायेगें?

दुनिया में हर कोई नंगा आया
बिना मजहब के
बिना धर्म के
बिना जाति के
बिना पूर्वाग्रह के
यहाँ हमने उसे दिया पहना
धर्म, मजहब, जाति का चोगा
राज्य,राष्ट्र्र्र का घर
संस्कारों के नाम पर की है ज्यादती
सब की है अपनी-अपनी जिद
– हमारा रास्ता ही अच्छा है
जो पहुँचायेगा मंजिल तक
क्या किसी ने देखा है
वह मंजिल?
जिसमें सभी एक साथ रहते हों
बिना मजहब, जाति, पंथ के
जहाँ नहीं है किसी प्रकार की दीवार
सिर्फ और सिर्फ मानव के

मेरे दोस्तों !
पहले गढऩा होगा वह देश-काल
जिसमें प्रयोगशाला नहीं
साध्य होना चाहिए
साधन के दौर में
मजहबी प्रयोग बहुत हो चुका अब
आनन्द, आमीन और पापमुक्ति के नाम पर
मत बहाओ
ईश्वरीय संवेदना का खून
मिलने दो अपने को परिवार से
घर की सीमा गाँव से
गाँव की सीमा देश से
देश की सीमा जगत से
एकात्मता का यही सूत्र
छिपाए है भूमा का सुख
आओ हम करे प्रार्थना
विशालता के हृदयोद्गार को प्रस्फुटित कर
पृथ्वी पुत्र बन।

Leave a Reply