‘छंद बंधते नहीं’

बहुत चाहता हूँ, पर अब छंद बंधते नहीं
जो कभी जिगरी थे मेरे, संग अब चलते नहीं |
हर वक़्त का अपना तकाजा होता है,
जब दिमाग चलने लगे, तो दिल मचलते नहीं |

तू किस शहर में रहता है मेरे दोस्त
मैंने लाखों भेजे, और तुझे पैगाम मिलते नहीं |

प्यार , रफ़्तार और नाभिकीय ऊर्जा करार, जरा सलीके से
वर्ना, चोट खा जाते हैं वो जो संभलते नहीं |

इस छोटेपन के दौर में, कितने छोटे हो गए हम
मोबाइल में तो मिल जाते हैं, पर घर पे लोग मिलते नहीं |

कुछ बड़ी है तो बस एक मंहगाई मेरे देश में
देखो सब्जियां मिल जाएँ शायद, फल तो अब मिलते नहीं |

आज फिर सड़क पर दम तोड़ गयी इंसानियत
वो लहू से लथपथ तड़पता रहा, और लोग निकलते रहे |

अब तो छंदों ने भी कह दिया है क्यूँ बंधें ?
बच्चे आजकल बाप की सुनते नहीं |

पर शहरों, मेरे संस्कार से रोशन हैं कई गाँव
कौन कहता है कि अब ‘प्रदीप’ जलते नहीं |

इस ओर आना हो तो मिलना जरूर
हम मिलेंगें, हम सिर्फ कहते नहीं |

 

प्रदीप

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