बंधन से गर छुटनूँ चाहत

शांत सुभाव करो मनवा, न जरो अविवेक के फंद में आकर ।

ज्ञान विचार दया उर धारके, राम चितार तू चित्त  लगाकर |

धीरज आसन दृढ जमाय के या विधि से मन को समझाकर |

बंधन से गर  छुटनू   चाहत, तू अजपा  उर  सत्य  जपाकर ||

 

नित्त ही चित्त प्रसन्न रखो यह साधन साधू से सिख तू जाकर |

फेर भी भूल परे तुमको धृक  है धृक  है  तन  मानव  पाकर |

क्रोध व तृष्णा को दूर करो कहूँ संत समागम संगत जाकर |

बंधन से गर  छुटनू   चाहत, तू अजपा  उर  सत्य  जपाकर ||

 

परलोक  बनावन से हटके मद क्रोध भर्‌यो तृष्णा उर आकर |

क्रोधको जीतके तृष्णा न राखत ज्ञानी वही गति ज्ञानकी पाकर |

जो मनको न दृढावत राम, कहो किन काम के ग्रन्थ पढ़ाकर |

बंधन से गर  छुटनू   चाहत, तू अजपा  उर  सत्य  जपाकर ||

 

अजपा वही जो जपे दिन रैन यह होता है स्वांस के साथ सुनाकर |

ध्यान से युक्त व सत्य परायण उच्च विचार हृदय में धराकर |

भोजन अल्प एकांत निवास तू थोरी ही नींद ले जाग उठाकर |

बंधन से गर  छुटनू   चाहत, तू अजपा  उर  सत्य  जपाकर ||

 

2 Comments

  1. Kailash Pareek Khandela Kailash Pareek Khandela 10/06/2012
    • Guest 10/06/2012

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