जिस्म सलामत लेकिन अपनी रूह को घायल कहता हूँ

जिस्म सलामत लेकिन अपनी रूह को घायल कहता हूँ
सन्नाटो का शोर सुनूं तो खुद को पागल कहता हूँ
जब हर्फ़ तुम्हारे भीगे खत में नैन को बादल कहता हूँ
ओढ़ के तन पर सारा यौवन तुम को आँचल कहता हूँ

– संजीव आर्या

Leave a Reply