गम-ए-दिल आज फिर अश्कों में नहाने निकले

गम-ए-दिल आज फिर अश्कों में नहाने निकले
तुम्हे भूलसे भी न भूल पाने के सौ बहाने निकले

हमारे पास खुद का एक लम्हा भी नहीं निकला
तुम्हारे पास तो गैरों के भी फ़साने निकले

कर लेते हैं फलक के चाँद से बातें हम अक्सर
जब भी तन्हाई में तुम्हारी यादें सताने निकले

तेरे हुस्न का चर्चा यूँ नहीं है बेखबर ज़माने में
मैं तेरी गली से क्या निकला के सारे दीवाने निकले

मेरे गाँव का घर मेरे दिल के बड़ा नज़दीक है
बस मुझे शहर से लौटते-लौटते ज़माने निकले

भूखे बच्चे आज फिर खीर की लोरियाँ सुनेगे
चावल के कनस्तर में मुट्ठी भर ही दाने निकले

कीमती लिबाज़ जिस्म के लिए बहुत ख़रीदे हमने
जिनमे रूह बसी है वो माँ के आँचल पुराने निकले

बादे-सबा में उसकी खुशबु हर तरफ फैली है
मैं उसको इधर ढूँढू तो वो किधर जाने निकले

इंसानियत तो हर जगह बस्तियां बनाती रही
सियासत ने जब भी उजाड़ा तो आशियाने निकले

माँ ने मुद्दतों इन्तेज़ार करते हुए दम तोड़ दिया
तुम दो अश्क बहाकर दूध का क़र्ज़ चुकाने निकले

हम हर इक शेर की वाहवाही पर मुस्कुराते रहे
जब गज़ल पूरी सुना दी तब अश्क बहाने निकले

-संजीव आर्या

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