क्या कहूँ ज़माने को

क्या कहूँ ज़माने को
ज़माना तो
अपनी चाल चलेगा
उगते सूरज को
सलाम करेगा
डूबते को अँधेरे में
धकेलेगा
हँसते के साथ हंसेगा
रोते को रुलाएगा
किसका हुआ है ज़माना
जो अब मेरा होगा
खुद को ही सहना
होगा
खुद को ही लड़ना
होगा
यूँ ही जीना होगा

12-05-2012
516-30-05-१२

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