इश्क…

आओ कुछ ऐसा करें की ना ज़मीन रहे ना आसमान रहे

जिस तलक नज़र गुज़रे बस अपने कदमों के निशाँ रहें

प्यार अपना अमर हो यह अरमान नहीं पर जब कभी

आशिकों का ज़नाज़ा निकले सबसे आगे अपना कारवां रहे

कह दो ज़माने से हमें मकबरे की ख्वाहिश नहीं

दीवारों पे चुनवा दें या फांसी पर कोई खलिश नहीं

जब कभी रुबायत लिखे कोई खुसरो हम पर

लिखे सिर्फ ‘इश्क इश्क इश्क ‘और कोई आतिश नहीं

जब कभी मुशायरों में अपने किस्से करना

कसीदों और शायरी से रोशन  हमें बेफिक्र करना

इश्क भले हमारा इबादत नहीं हीर रांझे ,लैला मजनू जैसा

इश्क रोशनाई का गुलाम नहीं इस बात का भी ज़िक्र करना

इश्क रजवाड़ों की जागीर नहीं और न ही बादशाओं का हरम

हमारी दौलत तो सदियों का साथ थी क्या मज़हब क्या धरम

जब कभी वसीयत लिखना अपनी ख्याल रहे ऐ जहांवालों

लिखना खजाना था उनके पास और नाम था ‘इश्क का मरहम’

                                                                                    —- शिवेंद्र

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