अशोक रावत की ग़ज़लें

अशोक रावत की ग़ज़लें

 1

जो   अमीर  थे  उन्हें महल दिये  गये,

और   जो   ग़रीब  थे  कुचल दिये गये.

 ख़ार बन के हम जिये तो कुछ नहीं हुआ,

फूल  बन  के जब जिये मसल दिये गये,

 हम   से ये कहा  गया बदल  रहे हैं पाठ,

पृष्ठ   संविधान   के   बदल  दिये  गये.

 सिर्फ़ इस क़सूर पर कि उनकी हाँ में हाँ,

हम  नहीं   मिला सके कुचल  दिये गये.

 ध्यान  ही  नहीं  दिया किसी ने शेर पर,

भावना  को   शब्द जब सरल दिये गये.

 कर्म    का  कहीं  कोई  हिसाब ही नहीं,

वर्ण   देखने   के  बाद   फल दिये गये.

अशोक रावत की ग़ज़लें

 2

 अब यही ज़माना है, परिक्रमा  शिवालों की,

अर्चना  अँधेरों  की ,कामना  उजालों   की.

 नीति  और  नैकिता  धर्म और अनुशासन,

कौन  फ़िक्र करता है आज इन खयालों की.

 भक्ति   और  पूजा से काम अब नहीं चलता,

अर्ध्य माँगती  हैं अब  मूर्तियाँ शिवालों की.

 पर्चियों  में लिख दें जो काम वो ही होता है,

किस में दम है ठुकरा दे पेशकश दलालों की.

 टूटते    नहीं   फिर    भी   हौसले लुटेरों के,

रात  दिन का पहरा है गश्त  कोतवालों की.

 चूर – चूर   सपने  हैं,   दूर – दूर  अपने हैं,

और  मेरे  चारों ओर   भीड़  है  सवालों की.

 जिस में हम नहीं होते जिस में तुम नहीं होते

एक  और  दुनिया  है   मर्सडीज़वालों   की.

अशोक रावत की ग़ज़लें

 3

तूफ़ानों  की हिम्मत  आँधी  का रुतबा देखा,

तुम लोगों ने मौसम का असली  चेहरा देखा.

 सूरज,  चाँद, सितारे  अँधियारों के क़्ब्ज़े में,

क्या हमने इस आज़ादी  का ही सपना देखा.

 अपराधी  संसद  के   भीतर  कैसे पहुँच गये,

जनता ने भी इन में आखिर ऐसा क्या देखा.

 मुझको तो हर पत्थर में तस्वीर  नज़र आई,

हर  पत्थर में  जब मैं  ने एक आईना देखा.

 फूल   बेचारे क्या  कहते   मौसम के बारे में,

समझ गया सब जब मैं ने इनका चेहरा देखा.

 मेरे   अधिकारोंवाले    पैरे     ही   ग़ायब   हैं,

ध्यान से मैं ने संविधान का हर पन्ना देखा.

 सारी   नैकताएं    शोकेसों   में    बंद मिलीं,

ऊँचे ऊँचे     गेटोंवाला    जो   बंगला  देखा.

अशोक रावत की ग़ज़लें

 4

सर  झुकाने उसकी चौखट  पर मैं रोज़ाना  गया,

ये अलग किस्सा है क़ाफ़िर क्यों मुझे माना गया.

 अब किसी की फ़िक्र  में ये बात शामिल ही नहीं,

नाम  जाना भी  गया तो किस लिये जाना गया.

 जो  हमारी जान  थी, पहचान थी,  ईमान   थी,

आज  उस   तहज़ीब   का हर एक पैमना गया.

 क़ातिलों का  पक्ष  सुन कर ही अदालत उठ गई,

बेगुनाहों   की   गवाही को  कहाँ   माना गया.

 उनकी  हाँ में  हाँ मिलाना   मुझको नामंज़ूर था

मेरे  सीने   पर  तमंचा   इसलिये  ताना गया.

 मैं   किसी  पहचान में  आऊँ न आऊँ ग़म नहीं,

मेरी ग़ज़लों  को तो दुनिया भर में पहचाना गया.

अशोक रावत की ग़ज़लें

 5

कोई कुछ भी कहे लेकिन बहुत सम्मान पाया है,

मेरी  ग़ज़लों  ने ही शायद कोई वरदान पाया है.

 बचा    लेता   है  मुझको भीड़  में  खोने नहीं देता,

विरासत   में  जो  थोड़ा सा मैं ने ईमान पाया है.

 कभी इतनी जटिल जिसका कही.हल ही नहीं कोई,

कभी इस ज़िंदागी को किस क़दर आसान पाया है.

 बना है सिर्फ़ फूलों के लिये हर काँच का गुलदान,

भला  काँटों   ने भी   कोई कभी गुलदान पाया है.

 न   दुनिया को अभी मैं ठीक से पहचान पाया हूँ,

न  कोई ठीक से मुझको अभी पहचान  पाया है.

अशोक रावत की ग़ज़लें

 6

 हाँ मिला तो मगर  मुशकिलों से मिला,

आईनों   का  पता  पत्थरों  से  मिला.

 दोस्ती आ गई  आज    किस मोड़  पर,

दोस्तों  का  पता  दुशमनों  से मिला.

 मैलबी     और     पंडित   घुमाते   रहे,

उसका  पूरा  पता  क़ाफ़िरो  से मिला.

 ढूँढ़ते    ढूँढ़ते   थक    गया   अंत  में,

मुंसिफ़ों  का पता  क़ातिलों  से  मिला.

 अड़चनें      ही   मेरी   रहनुमा  हो गईं,

 मंज़िलों   का   पता  ठोकरों से मिला.

 जाने क्या  लिख  दिया उसनेतक़दीर में,

मुझको जो भी मिला मुशक़िलों से  मिला.

 अशोक रावत की ग़ज़लें

7

 हमारे  हमसफ़र भी घर से जब बाहर  निकलते हैं,

हमेशा बेच में कुछ फ़ासला रख कर  निकलते  हैं.

  छतों   पर   आज    भी  उनकी  जमा हैं ईंट के अद्धे,

कहीं  क़ानून   से सदियों   पुराने डर  निकलते  हैं.

 समझ   लेता   हूँ  मैं दंगा  अलीगढ़  में हुआ  होगा,

मेरी बस्ती में मुझसे लोग जब बच कर निकलते हैं.

 किसे  गुस्सा  नहीं      आता  कहाँ  झगड़े नहीं होते,

मगर हर बात पर क्या इस तरह ख़ंजर निकलते हैं.

 जिन्हें हीरा समझ कर रख लिया हमने तिज़ोरी में,

कसौटी पर परखते हैं तो  सब पत्थर  निकलते हैं.

 कहीं  पर  आग लग जाये,  कहीं  विस्फोट हो जाये,

हमेशा  खो ट  मेरी    कौम  के  भीतर निकलते  हैं.

अशोक रावत की ग़ज़लें

8

जिन्हें अच्छा  नहीं  लगता हमारा मुस्कराना भी,

उन्हीं     के साथ लगता है  हमें तो  ये ज़माना भी.

इसी  कोशिश   में दौनों हाथ मेरे हो गये ज़ख़्मी,

चराग़ों  को जलाना  भी, हवाओं  से  बचाना भी.

अगर  ऐसे   ही   आँखों   में जमा होते रहे आँसू,

किसी  दिन  भूल जायेंगे खुशी में मुसकराना भी.

 उधर ईमान की ज़िद है कि समझौता  नहीं  कोई,

मुसीबत  है  इधर दो वक़्त की रोटी जुटाना  भी.

किसी गफ़लत में मत रहना नज़र में आँधियों के है,

तुमहारा  आशियाना   भी  हमारा  शामियाना  भी.

परिंदों  की  ज़रूरत   है खुला आकाश  भी  लेकिन,

कहीं  पर  शाम   ढलते  ही  ज़रूरी है  ठिकाना भी.

ज़ियादा  सोचना  बेकार  है, इतना समझलो बस,

इसी  दुनिया  से लड़ना है, इसी से है निभाना भी.

अशोक रावत की ग़ज़लें

9

मन  तो मेरा  रोशनी से भर दिया है,

पर  उसूलों  ने  अकेला कर  दिया है.

मंज़िलों  ने कुछ न समझा हो भले ही,

रास्तों   ने    पर  हमें  आदर दिया है.

कोई   रंजिश   मानता है,  माने, हमने,

साथ जिसका भी दिया, खुल कर दिया है.

जिसमें  खिड़की   है न रोशंदान कोई,

देनेवाले   तू   ने   कैसा  घर  दिया है.

जो   किया  ईमनदारी  से किया सब,

बिल  भरे  फीसें  चुकाईं  कर दिया है.

हर  खुशी   बेचैन  कर देती है,  तू ने,

हर  खुशी के साथ इतना डर दिया  है.

अशोक रावत की ग़ज़लें

10

आसमाँ   में   डूबनेवाले  सितारों  की  तरफ़,

ध्यान  किसका है शहीदों के मज़ारों की तरफ़.

साख  फूलों  की गिरी है, इसमें कोई शक़ नहीं,

किस  लिए पर देखते  हैं लोग ख़ारों की तरफ़.

सब्र    मेरा टटता    है  सोचता  हूँ  क्या करूँ,

देखता   हूँ  जब झुलसते  देवदारों  की तरफ़.

उस तरफ़ सूरज उगा भी और फिर ढल भी गया,

देखते   ही   रह गये हम लोग तारों की तरफ़.

ध्यान   हटता  ही नहीं विस्फोटकों  के शोर से,

चैन   में  जी हो  तो  देखूँ  भी बहारों की तरफ़.

शाम  का  ढलना हुआ बस्ती  हमारी लुट गई,

उँगलियाँ   फिर उठ  रही हैं पहरेदारों की तरफ.

अशोक रावत की ग़ज़लें

11

उजाले   तीरगी   में ढल गए हैं,

दिये   तो  शाम से जल गए हैं.

चराग़ो की  हिफ़ाज़त कर  रहा हूँ,

भले   ही  हाथ मेरे  जल गए हैं.

हमें  हर  रास्ता  पहचानता  है,

जहाँ   भी हम  गए पैदल गए हैं.

जहाँ  जाना  नहीं था तो नहीं था,

जहाँ जाना था सर के बल गए हैं.

कोई हहलचल  नहीं है आसमाँ पर,

न जाने किस तरफ़ बा दल गए हैं.

बड़ी  उम्मीद थी जिन फ़ैसलों  से,

वो   सारे  फ़ैसले फिर टल गए हैं.

अशोक रावत की ग़ज़लें

12

 सुलह   का  एक   दस्तावेज़  फिर तैयार करते हैं,

चलो हम ग़लतियाँ अपनी सभी स्वीकार करते  हैं.

में   परदों   को  हटा  देता हूँ खिड़की खोल देता हूँ

मेरी  आलोचना     घर के  दरोदीवार      करते हैं.

हमें  काँटे  चमन  के  चाहते हैं आज भी लेकिन,

न  जाने   फूल कैसे हैं कि छुप कर वार करते हैं.

परों को  बेच देती हैं यहाँ पर तितलियाँ  ख़ुद ही,

यहां   ख़ुद  फूल अपनी गंध का व्यापर करते हैं.

किताबों  में  सिमट कर रह गये आदर्श नैकिता,

न इनका मान पंडित ही न अब फ़नकार करते हैं.

अशोक रावत की ग़ज़लें

13

जी   रहे हैं  लोग  आखिर किन उसूलों के लिये,

सिर्फ़  नक़ली गंध और काग़ज़ के फूलों के लिये.

देखना  भी छ्ड़ दें  क्या  हम उजालों की तरफ़,

जो   अँधेरों   ने   बनाए     उन उसूलों के लिये.

ये  कहाँ  की  सभ्यता  है ये कहाँ का न्याय है,

नछलियाँ  पाएं  सज़ा सागर की  भूलोंके लिये.

बाग़ के  फलादार वृक्षों के लिये कुछ भी नहीं,

योजनाओं   के  पिटारे    हैं  बबूलों   के लिये.

क्या करें ये नीम शीशम और पीपल के दरख़्त,

एक  भी  बादल  नहीं सावन के झूलों के लिये.

अशोक रावत की ग़ज़लें

14

भूल जाते  हम दियों में जो कमी होती,

इन दियों से पर कहीं तो रोशानी होती.

आ रही  होती अज़ानें  मंदिरों से काश,

मस्ज़िदों  में  शंख बजते आरती होती.

असली फूलों  को  कहीं टिकने नहीं देते,

काग़ज़ी फूलों में किंचित  ताज़गी होती.

दुश्मनी   भी दोस्ती  का  ही सिला तो हैं,

दोस्ती ही  जब  नहीं क्या दुशमनी होती.

यूँ निकल कर तो नहींआते सड़क पर लोग,

यदि  कहीं  उम्मीद  कोई   दिख रही होती.

इस   तरह से प्यास  से बेबस नहीं होते,

यदि   तुम्हारे    सोच   में कोई नदी होती.

अशोक रावत की ग़ज़लें

15

क्या  कमी है  और किस क़ाबिल नहीं हैं हम,

सिर्फ़  इतना है  कि  पत्थर दिल नहीं हैं हम.

इस  तरक़्क़ी से शिकायत  क्यों न हो हमको,

इस  तरक़्क़ी   में  कहीं शामिल नहीं हैं हम.

वक़त   की रफ़्तार पर वश तो नहीं लेकिन,

वक़त  की रफ़्तार से गाफ़िल  नहीं हैं हम.

टूट   जायें    हम  किसी    सैलाब के डर से,

रेत    माटी के  बने   साहिल  नहीं  हैं हम.

भूल जाओ ताक़ पर रख के जिसे तुम लोग,

लाल   फ़ीते  से  बंधी  फाइल नहीं हैं हम.

हम किसी  की  वर्दियों से क्यों डरें आख़िर,

चोर डाकू चोर या  कोई क़ातिल नहीं हैं हम.

साधना और  धैर्य का परिणाम हैं हम लोग,

युद्ध  के   मैदान      का हासिल  नहीं हैं हम.

अशोक रावत की ग़ज़लें

16

भले  ही रोशनी कम हो मगर ताज़ा   हवा तो  है,

हमारे  पास   ज़िंदा  रहने का    एक रास्ता तो है.

हमारे  पास  रुतबा है ,न शौहरत है न  वैभव ही,

भले ही कुछ न हो जीने का लेकिन हौसला तो है.

तुम्हारे  पास  फ़ुर्सत ही कहाँ  रिश्ता  निभाने की,

वो मेरा कुछ नहीं लगता मगर मुझसे ख़फ़ा तो है.

मुझे  कुछ  भी नहीं कहना है उसकी बेवफ़ाई पर,

अदावत ही सही रिश्तों का कोई सिलसिला  तो है.

उसे  तुलसी  कहो मीरा कहो रसखान या दुष्यंत,

उजालों      के  समर्थन   में  कहीं कोई खड़ा तो है.

नहीं  मालूम क़र्फ़्यू क्यों लगा है शहर में लेकिन,

धुआँ  इतना  बताता है कहीं पर कुछ हुआ तो है.

कभी खिड़की कभी चौखट  कभी दहलीज़के पत्थर,

हमारी  ग़लतियों  पर कोई हम को टोकता तो है.

अशोक रावत की ग़ज़लें

17

ग़रज़  ये है कि हमको एक दिन बद्नम्म होना था,

हमारी  चाहतों का  और क्या अंजाम   होना था.

अँधेरे   पाँव  अपने  पोंछते हैं  आज तक उससे,

वो टुकड़ा धूप का जिसको हमारे नाम होना था.

हमारे    घर   की  कुछ ईंटें बड़े ईमानवाली  थीं,

हमारे  घर   को तो हर हाल में नीलाम होना था.

बड़े  परिवार  में  आख़िर कहाँ झगड़ा नहीं होता,

मगर हर बात परक्या इस तरह कोहराम होना था.

पुराने   मर्ज़    थे  अछी   दवाओं की ज़रूरत थी,

 भला   कोरी    दुआओं  से किसे आराम होना था.

ज़रूरत सिर्फ़ इतनी थी कि तुम इनसान हो जाते,

न तुमको राम होना था न तुमको श्याम होना था.

 व्यस्था  जिस तरह से चल रही है और क्या होता,

बहुत सी कोशिशों को एक दिन नाकाम होना था.

अशोक रावत की ग़ज़लें

18

इस  क़दर  हालात यदि मुशकिल नहीं होते,

तो  बहुत से   लोग  पत्थर  दिल नहीं होते.

सिर्फ़  निर्बल  का सहारा हैं धरम – ईमान,

इनसे   ऊँचे  लक्ष्य अब हासिल नहीं  होते.

रौशनी, पानी, हवा, घर   को तरसते लोग,

और  क्या   होते  अगर क़ातिल नहीं होते.

इन  ख़ुदाओं  से बहुत  उम्मीद मत रखना,

ये   किसी   के दर्द  में शामिल   नहीं होते.

मान लेता हूँ कि पत्थर हो गये हो गये हम,

पर  सभी  पत्थर भी पत्थर दिल नहीं होते.

डूब     ही   जाती  हमारी   नाव  दरिया में,

यदि    हमारे  सोच  में  साहिल   नहीं  होते.

अशोक रावत की ग़ज़लें

19

हाँ अकेला हूँ मगर  इतना  नहीं,

तूने    शायद  गौर से  देखा नहीं.

तेरा  मन बदला है कैसे मान लूँ,

तूने  पत्थर  हाथ का फैंका नहीं.

छू  न  पायें  आदमी  के हौसले,

आसमाँ    इतना कहीं ऊँचा नहीं.

नाव   तो  तूफ़ान में मेरी भी थी,

पर मेरी हिम्मत कि में डूबा नहीं.

जानता  था  पत्थरों की ख़्वाहिशें,

पत्थरों  को  इस लिये पूजा नही.

मैं  ज़माने से  अलग होता गया,

मैंने   अपने   आपको बेचा नहीं.

अशोक रावत की ग़ज़लें

20

उनके तो  खोटे  सिक्के  भी सौ बार खरे हो जाते हैं,

जब  मेरा  नम्बर  आता है  क़ानून कड़े हो जाते हैं.

हर एक ज़रूरत पर  उनकी जी जान लगा देता हूँ मैं,

जब   मुझे  ज़रूरत  होती है  वो दूर खड़े हो जाते हैं.

ये सीलन  मेरी  आँखों की  ज़ख़्मों में ऐसी बैठ गई,

जब  चलती है  पुर्वाई तो सब  ज़ख़्म हरे हो जाते हैं.

कुछ  लोग सगे  होते हैं  पर रहते हैं अनजानों जैसे,

पर  ऐसा   भी  हो जाता है  अनजान  सगे हो जाते हैं

ये जीवन है इस जीवन में, सब यूँ  ही चलता रहता है,

कुछ लोग निकट आ जाते हैं कुछ लोग परे हो जाते हैं.

अशोक रावत की ग़ज़लें

21

वादे  और  उम्मीदें जाने  किधर गये,

धीरे     धीरे   सारे सपने बिखर  गये.

फिर फिर बाँटी अपनों  को ही रेबड़ियाँ,

आज़ादी   के  साठ  बरस यूँ गुज़र गये

एक  उदासी  का  साया  हर चेहरे पर,

सहमे सहमे लोग मिले हम जिधर गये.

जिन लोगों पर हमको बहुत भरोसा था,

कुछ उनमें से इधर गये,कुछ उधर गये.

 काँटों  में    रह कर  फूलों    से हमदर्दी,

 ये  कारण था हम काँटों को अखर गये.

अँधियारों   ने   जैसे    ही  मौका  देखा,

आकर  मेरे घर  आँगन  में पसर गये.

बहुत  ज़ियादा माथापच्ची  क्या करते,

हिम्मत की और चक्रव्यूह में उतर गये.

अशोक रावत की ग़ज़लें

22

इधर उधर  की बातें की दुविधा  में डाल दिया,

उसने  हर  मुद्दे   को  चालाकी   से टाल दिया.

पागल    पंछी  आसमान  में उड़ना  भूल गये,

तुमने  इनको सुविधाओं का  कैसा जाल दिया.

 जब जब हमने उल्झन सुलझाने की कोशिश की,

 हर  कोशिश ने  एक नई उल्झन में डाल दिया.

वो    ही   आँधी, वो  ही तूफ़ाँ,  वैसे  ही सैलाब,

क्या बोलें क्या मौसम ने हमको इस साल दिया.

बलिहारी इस लोकतंन्त्र  की जब  तूफ़ान उठा,

जुर्म   किसी का दोष किसी के सर पे डल दिया.

घटनाओं   की ख़बरें तो मिल  जाती हैं  लेकिन

हमसे   पूछा और  न उसने अपना हाल दिया,

अशोक रावत की ग़ज़लें

23

वंशीवाले    यदि  तेरा  वरदान  नहीं  होता,

तो इज़्ज़त से जीना भी आसान  नहीं होता.

जिसने पार उतरने का संकल्प ले लिया है,

उसकी हिम्मत पर हाबी  तूफ़ान नहीं होता.

चर्चा तो काँटों की किस्मत में भी होती है,

लेकिन  फूलों  के जैसा सम्मान नहीं होता.

मन का लालच ही ले जाता है इन राहों पर,

मजबूरी     में   कोई   बेईमान  नहीं  होता.

मलबे में तब्दील न हो जाती  सारी  दुनिया,

लोगों की करनी में यदि  ईमान   नहीं होता.

पूजे  तो   पत्थर के बुत ही जाते है लेकिन,

पत्थर के किस टुकड़े में भगवान नहीं होता.

अशोक रावत की ग़ज़लें

24

छोटी      छोटी  बातों  पर  दंगा हो जाता है,

जाने   बस्तीवालों को  भी क्या हो जाता है.

एक मांस का टुकड़ा मिलता है मंदिर के पास,

बात ज़रा   सी है फ़िर भी बलवा हो जाता है.

पांच    बजे  हो  जाते हैं घर के दरवजे बंद,

सात बजे  सड़कों  पर सन्नाट्टा हो जाता है.

पँवों     की  जूती   हो जाते हैं सारे  क़ानून,

राज्नीति  में    कालाधन  चंदा हो जाता है.

चौथ बसूलो, हफ़्ता दो, जी भर के मौज करो,

पकड़ा  भी जाये   तो कोई  क्या हो ज ता है.

मैं   आदर्शों    पर चलने की बातें  करता हूँ,

मेरा  अक्सर   लोगों से  झगड़ा हो जाता है.

अशोक रावत की ग़ज़लें

25

दम्भ और अनीति को सहन नहीं किया.

मैंने  अँधकार  को  नमन  नहीं किया.

रास्तों  की  साधना से मंज़िलें  मिलीं,

मैंने   कोई  दूसरा जतन  नहीं  किया.

उनकी   हर  पुकार  पर  बढ़े चले गये.

हमने  दूरियों का आकलन नहीं किया.

मेरे  फ़र्ज़    ही  थे मेरी  पूजा अर्चना,

मैंने  कोई  कीर्तन भजन  नहीं  किया.

मेरी   चेतना   सदै   व  मेरे  साथ थी,

मैंने  यंत्रवत  कभी  हवन  नहीं किया.

कुछ     दरख़्त  आँधियों में टूट ही गये,

आँधियों को पर कभी नमन नहीं किया.

अशोक रावत की ग़ज़लें

26

सुख  से पहले मैं  दुख का आभार मानता हूँ,

संघर्षो  को  मैं जीवन  का आधार मानता हूँ.

अपनी  गंधों पर जो करने लगते हैं अभिमान,

ऐसे  फूलों    को  भी  मैं  तो ख़ार मानता हूँ.

टकराते  ही  रहते हैं  हर कश्ती से  तूफ़ान,

मैं  क्या  ऐसे  तूफ़ानों   से हार  मानता  हूँ.

अपने   दम पर  जीने को ही जीना कहते  हैं,

अमरबेल    सा  जीना  मैं  बेकार मनता  हूँ.

हर क़ीमत पर जिसने मानवता का साथ दिय,

केवल  उनको  मैं सच्चा फ़नकार  मानता हूँ.

जिसने  अंधकार में मेरा दो पल साथ  दिया,

उस   नन्हे   जुगुनू का मैं  उपकार मानता हूँ.

अशोक रावत की ग़ज़लें

27

जो   लुटे     वही  क़सूरवार  हो  गये,

राज़न   तो   लूट   के फ़रार  होग  ये.

कोशिशें सुलह की इस तरह से की गईं,

खिड़कियाँ खुलीं  तो बंद द्वार  हो गये.

अंधकार   का  प्रभाव  इस तरह  बढ़ा,

रोशानी   के  स्वप्न तार तार  हो गये.

पत्थरों  की साज़िशें  कि हर गुनाह में,

बेकसूर    आईने   शुमार     हो   गये.

इस तरह अनीति की हवा चली कि फूल,

ख़ु ब ख़ुद चमन से दरकिनार   हो गये.

 नीयतों  में  कुछ सुधार हो तो फल मिले,

नीतियों       में  तो सभी  सुधार  हो  गये.

अशोक रावत की ग़ज़लें

28

अगर तू इक दिया उम्मीद का मन में जला देता,

उजाला   सैकड़ों    सम्भावनाओं  का   पता देता.

परिंदे    भूल  जायें  पेड़ को ये बात मुमकिन है,

मगर    वो  पेड़ था   कैसे  परिंदों को भुला दता.

ज़माने  के चलन  मैंने अगर अपना लिये  होते,

मुझे  भी ये ज़माना  एक दिन पत्त्थर बना देता.

अगर   ए   ज़िंदगी    तू साथ मेरा भी कभी देती,

तोअपनी हरखुशी मैं एक दिन तुझ पर लुटा देता.

नहीं   तूफ़ान   उसकी  राह में आता  कभी कोई,

वो  दरिया पार करने का इरादा यदि जता देता.

मुझे इस बात से शायद  कहीं ज़्यादा ख़ुशी होती,

मुझे  अपना  समझता  और जब चाहे दग़ा देता.

अशोक रावत की ग़ज़लें

29

मारे  जानेवालों    में  तो   हम  होते हैं,

फ़ोकस में लेकिन ताक़तवर   बम होते.

हाथ    बढ़ानेवाले    भी  होते  हैं लेकिन,

साथ   निभानेवाले   इनमें  कम  होते हैं.

बातें कुछ होती हैं मतलब कुछ होता है,

जिन लोगों  के हाथों में परचम होते हैं.

उनकी    बातों  में    होती हैं  नैतकताएं,

ख़्वाबों    में  हीरे मोती  नीलम  होते हैं.

अपनों को जब परखा तो ऐसा लगता है,

रिशते नाते केवल  मन का भ्रम होते हैं.

 

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30

तुमने जो करना था आख़िरकार  कर दिया है,

उत्तर  तो   देना   ही  है  जब वार कर दिया है.

जो भी कर सकते हों कर लें  ये आँधी तूफ़ान,

शीश    झुकाने  से मैं  ने  इंकार कर दिया है.

मुझ   पर  लापरवाही  का आरोप  लगाते हैं,

सपनों   ने  मेरा जीना  दुश्वार   कर दिया है.

बहुमत   चाहे  काँटों  का हो लेकिन फ़ूलों ने,

काँटों   की  सत्ता को अस्वीकार कर दिया है.

सिर्फ़   दस्तख़त करने हैं पेड़ों को काग़ज़ पर,

आँधी   ने अनुबंध   नया तैयार  का  दिया है.

इतने  सारे  पत्थर क्या  सब झूठ बोलते  हैं,

तुमने  अपनी  नीयत का इज़हार कर दिया है.

अशोक रावत की ग़ज़लें

31

गंधों  की मनमानी  को कैसे स्वीकार करूँ.

कैसे  फूलों  से नफ़रत  काँटों से प्यार करूँ.

मैं भी शामिल हो जाऊँ क्या अंधी भीड़ों में,

मैं  भी आँधी तूफ़ानों  की जै जैकार  करूँ.

साहिल से  मुझको  माँझी आवाज़ दे रहे हैं,

उनकी   काग़ज़  की  नावों दरिया पार करूँ.

बंदूकों   ने   सर  पर गाँधी टोपी रख ली है,

इनके  प्रस्तावों  को  में कैसे स्वीकर करूँ.

अपने  हाथों  के  पत्त्थर तो मैं ने फ़ैंक दिये,

लोगों  को  चुप रहने पर कैसे स्वीकर करूँ.

इस मुद्दे  पर मैं अपनी ग़ज़लों के साथ नहीं,

ग़ज़लें ये कहती हैं मैं उन का व्यापार करूँ.

मेरे  अधिकारों  को लेकर सब के सब चुप हैं,

अपनों से ही झगड़ा आखिर  कितनी बार करूँ.

अशोक रावत की ग़ज़लें

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राहतें  कब  थीं सुखी इंसान  कब था,

ज़िंदगी  जीना  यहाँ  आसान कब था.

हम भी उसकी दुनिया में ही जी रहे थे,

पर  हमारी ओर उसका ध्यान कब था.

आज  भी कुछ ख़ास लोगों के लिये है,

आम  लोगों के लिये भगवान कब था.

उसने   सोचा  ही  नहीं  मेरे विषय में,

मुशकिलों से वो मेरी अनजान कब था.

मैं किसी पर किस तरह उँगली उठाऊँ,

मेरे  वश में  ही  मेरा  ईमान  कब था.

ज़िंदगी   पूरी   अँधेरों   में    बिता दी,

रोशनी  पर उनको इत्मीनान  कब था.

अशोक रावत की ग़ज़लें

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अनुबंधों   को   जीते हैं, शर्तों को जीते हैं.

शब्द कहाँ अब कालजयी अर्थोंको जीते हैं.

गंधों ने भी गाँठ  लिये हैं  काँटों से रिशते,

फूल   कहाँ अब  पावन संदर्भोंको जीते है.

रास नहीं  आती है  ताज़ा फूलों की ख़ुशबू,

देवालय  भी  आयातित गंधों  को जीते हैं.

अँगन खिड़की दरवाज़ों को भूल गये हैं हम,

केवल   घर  की  ऊँची  दीवारों को जीते हैं.

रोज़ वही ख़ामोश सफर सदियों से रातों का,

चाँद  सितारे  जाने  किन शापों को जीते है.

कितनी जल्दी आदर्शों को भूल गये हैं लोग,

राम   नहीं  अब रावण के तर्कों को जीते हैं

अशोक रावत की ग़ज़लें

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जीते  हैं   पर  इस  जीने में  चाव नहीं कोई,

मन   को राहत  दे ऐसा प्रस्ताव नहीं कोई.

मन पर जितने घाव बने हैं सब अपनों के है,

जल्दी   पुरनेवाला   इनमें  घाव  नहीं  कोई.

जाने   कैसे  परख   रही  है  हीरों को दुनिया,

नक़ली  के आगे असली  का भाव नहीं कोई.

वो  ही  भाषण, वो ही वादे, वो ही सब बातें,

कुछ परिवर्तन हो  ऐसा  बदलाव नहीं कोई.

माँझी  के  मन  में होता है तूफ़ानों का डर,

तूफ़ानों   से   डरनेवाली    नाव  नहीं  कोई.

केवल इतना जान सका हूँ  ये जो जीवन है,

नदियोंका जल  है जिसमें  ठहराव नहीं कोई.

अशोक रावत की ग़ज़लें

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बढ़े चलिये,  अँधेरों  में ज़ियादा  दम नहीं होता,

निगाहों का उजाला भी दियों से कम नहीं होता.

तप्स्या त्याग  यदि भारत की मिट्टी में नहीं होते,

कोई  गाँधी नहीं होता,  कोई  गौतम  नहीं होता.

मनुष्यों की  तरह  यदि पत्थरों में चेतना  होती,

कोई पत्थर मनुष्यों की तरह  निर्मम  नहीं होता.

भरोसा    जीतना है   तो  ये ख़ंजर   फैंकने होंगे,

किसी हथियार से अम्नो- अमाँ क़ायम नहीं होता.

ज़माने   भर  के  आँसू उनकी आँखों रहे  तो क्या,

हमारे   वास्ते  दामन तो उनका नम नहीं होता.

परिंदों   ने  नहीं  जाँचीं  कभी  नस्लें दरर्ख्तों की,

 दरख़त इनकी नज़र में साल या शीशम नहीं होता.

3 Comments

  1. Sunil Shwet 04/06/2012
    • Ashok Rawat 04/06/2012
      • Sunil Shwet 05/06/2012

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