३९२९. कभी तुमने मिलने का वादा किया था, इसी वास्ते मैं जिए जा रहा हूँ

३९२९. कभी तुमने मिलने का वादा किया था, इसी वास्ते मैं जिए जा रहा हूँ

 

कभी तुमने मिलने का वादा किया था, इसी वास्ते मैं जिए जा रहा हूँ

अगर मिल न पाएं तो अपनी वसीयत, तुम्हारे लिए मैं किए जा रहा हूँ

 

लिखा है ये इसमें कि  दीवान मेरा तुम्हारा है, नग़्मे मेरे गुनगुनाना

मिलेगा मेरी रूह को चैन इससे, मैं एहसास दिल में किए जा रहा हूँ

 

बहुत ग़म भरा है तरानों में मेरे, ये मुमकिन है तुमको न ये रास आएं

इन्हें मत जलाना, किसी दिल-जले को, थमा देना, तुमको दिए जा रहा हूँ

 

शिकायत नहीं है मुझे कोई तुमसे, जवां-दिल हो तुम हैं जवां ख़्वाहिशें भी

कसम है तुम्हें न ये छूना कभी भी, ये जामे-ज़हर जो पिए जा रहा हूँ

 

ख़लिश अलविदा, मेरे महबूब तुमने भरी रौशनी थी मेरी ज़िंदगी में

बुझाई है लौ भी तुम्हीं ने मगर अब इलज़ाम खुद पे लिए जा रहा हूँ.

 

महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

२५ मई २०१२

 

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