पुराने बगीचे में

पुराने बगीचे में

पूरे अट्ठारह साल बाद एक मुरझाते हुए कम व्यस्त बगीचे में
फिर बैठा दिखा
मैं यों अपने आपको:
बेहद साधारण और अतिशय फुर्सत में रहने वाला
निहायत अज्ञात मुँहासों से भरा
पिचके गालों वाला घोर गैर जिम्मेदार निश्ंिचत काॅलेज-विद्यार्थी।

सूखती हुई घास थी पिघलती हुई और जल रहा था पानी।
पेड़ों ने छोड़ दीं थी जड़ें और वे बिल्कुल मनुष्यों जैसे थे:
लाचार और सत्वहीन।

सड़क के उस पार और फैंस के इधर उतनी सी साधारण एक लड़की थी
चाय की दुकान पर
जो अपनी वाचाल माँ को मूर्ख बना कर शहर की तमाम अटपटी जगहों में
लगभग हर दिन अपने उस प्रेमी से मिलने आया करती थी
जिसका हुलिया पांचवीं और छठी पंक्ति में वर्णित है।

मूंगफलियों के छिलकों में बिखरा था समाज।
कचरे के ढेर में पड़ी थीं दिनचर्याएँ।
पत्तों में उड़ रहा था भविष्य।
मृत्यु हर कहीं थी और कहीं नहीं थी।
चाय के शीशे में अचानक दिखा सिर पर सफेद बाल।
एक काव्य-बिम्ब उभरा और डूबा।

अचानक याद आया अपनी बेटी का चेहरा।
अचानक मैं हुआ उदास।
अचानक चाहा इस पर कविता लिखूँ।
सफेद होते बालों वाले
अपनी बेटी का भविष्य सोचते एक उदास आदमी की बदली हुई शक्ल में
देख कर खुद को अट्ठारह साल पुराने एक मुरझाए हुए बगीचे में,
मैंने प्रेम-कविता लिखी
पूरे अट्ठारह साल बाद
बगीचे से बाहर आ कर।

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