किला जयगढ़: सात कविताएं

किला जयगढ़: सात कविताएं

1

नीलचिडि़यों के भीतर से बीत रही
कोई दुपहरी नहीं
एक खाली पड़ी बावड़ी है-यह दिन

वर्ष बुर्जों और गोखों में छिप कर
बैठ गए हैं
घायल छापामार योद्धाओं की तरह

ढलती धूप में
बज रहे हैं
सूखी चट्टानों के कंकाल

किस ब्रह्मराक्षस की प्रतीक्षा में है
सदियों से
काल-भैरव ?
दिया-बुर्ज पर अब कोई नहीं जलाता रोशनियाँ
दो सौ सत्तर बरस से
ठण्डी पड़ी है
यहीं
संसार की सबसे बड़ी तोप-
‘जयबाण’ !

2

कितना भी गहरा खोदो
हाथ नहीं लगता खजाना
अगर वह वहाँ नहीं बचा

निश्चय ही कोई
बीजक गलत था, उसका
काल नहीं . . . .

कुंड का चालीस हाथ गहरा काला जल
जयगढ़ के चैक में खड़ा
हर लालच का मुँह चिढ़ाता रहेगा अब से
हर इतिहास में

3

ठीक मेरी ही तरह
भूलभुलैया की चक्करदार दीर्घाओं की
गुत्थी सुलझा कर तुम भी
कहीं तो पहुंचोगे अन्ततः
शायद उसी पछतावे और अवसाद पर

बरसों से दीवारें जहाँ थीं
वहीं हैं, आज भी

व्यंग्य से देखता रहता है
लक्ष्मी-विलास की बेजान शाही तस्वीरों को
टेढ़ा काल-भैरव !

4

सतबहनें क्या खोज रही हैं
इस रेत में ?
कोई स्मृतिचिन्ह नहीं
व्यस्त सैलानियों के लिए
पुराने पत्थरों की
सिर्फ एक और इमारत है यह

कवियों के लिए
आत्मा के उजाड़ में
झाकने की समयातीत खिड़की

5

जल गई है
घास
और हवा में उजड़ी हुई धूप के चकते
हिल रहे हैं
ढूंढार चट्टानों पर खड़ा है
हताश जयगढ़

वैभवशाली इतिहास के पटाक्षेप पर
यहीं से दिखती होगी
‘जयबाण’ की नाल को कभी
आमेर की सुरम्य घाटी
अब जयपुर शहर की धंुधुआती आकाश-रेखा ही देख सकता हूँ
प्रसन्नता है मुझे
इस क्षण
सवाई जैसिंह का दुःख मेरे दुःख से बहुत कम है

6

अगर न भी जलाएं
इसकी देहरी पर
धूपबत्ती या दिया
यह शिव मंदिर, शिव मंदिर ही कहलाएगा
भविष्य के जयगढ़ में भी
काल नहीं सुनता किसी की भी प्रार्थना
कल हम सुनेंगे
न जाने किस किस के एकांत ?
7

प्रिय विद्याधर,
आप किस लोक में हैं ?
शस्त्र और शास्त्र अंततः हार ही जाते हैं
और
बुर्ज एकाएक
टिकट-खिड़कियों में बदल दिए जाते हैं
सिर्फ लोहा बूढ़ा होता है
कपाटों का
और
एक अट्टहास गूंजता रहता है
बरसों तक
ठहरी हुई हवाओं में।

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