द्वारकाधाम : तीन कविताएं

द्वारकाधाम: तीन कविताएं

एक

यों कहने को तो मारी जा चुकी हैं
ओखा के सागर की मछलियां
पर धरती के नथुनों में छोड़ गया है
अजस्त्र दुर्गंध
उनकी अनसुनी चीखों का शाप

दो

डालते ही समुद्र
तुम्हारा हाथ झटक देता है
इसी ने गुपचुप निगले हैं
न जाने कितने ही साम्राज्य और सभ्यताएँ
लहर आती है सागर से तट तक
लौट कर जाती नहीं वही फिर समुद्र में
तुम समयातीत होते हो
हर समुद्र के सामने
फिर यह लहर तो कच्छ के सागर की है
इसके लिए
सचमुच बहुत छोटा है
तुम्हारा हाथ

 

तीन

काल के निस्सीम सागर में
निरीह पृथ्वी के बचे हुए टुकड़े की सूरत में
कच्छ की खाड़ी के किनारे
लहरों पर लगभग टँगा दिख रहा है आर्यावर्त का
चैथा-धाम

हे पार्थ
तुम केवल एक टापू या ‘बेट’ कह कर इस क्षण के बाद
इसे अनदेखा न कर सकोगे

भयावह है यह देखना
बेट-द्वारका अब एक जगह भर है
जिस तक पहुँचने के लिए वैष्णवजन
जैटी पर समुद्र के थपेड़े खा रही नौकाओं में
चढ़ रहे हैं
सोने के महलों और कंगूरों को बहा कर
ले जा चुकी हैं अनन्त गर्भ में लहरें
इतिहास की रेत में उनके अक्स झिलमिला रहे हैं
तीर्थयात्रियों को नहीं इन सब से सरोकार
वे द्वारकाधीश के दर्शनों के बाद
काल्पनिक मोक्ष की आभा से दीप्त
डगमगाती हुई काठ की नावों में ठसाठस भरे वापस
अब ओखा की तरफ लौट रहे हैं

अक्सर हमारे उत्कर्ष का अन्त ऐसा ही
दारूण होता है हर इतिहास में
दीप्तिमान् और दयनीय पीछे छूटते
ओ महान् द्वारकाधाम

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