रणथंभोर

जब तक इसे देखें यह एक दृश्य है
पहाड़ किसी कछुए की पीठ
बढ़ी हुई हजामत जंगली घास
चकित चितकबरे हिरण
आसमान एक तम्बू लगातार

किसी नींव के बगैर
मैं बिल्कुल नई हवा में
खड़ा हूँ: अभी-अभी जन्मा

बुझती जा रही है दिन की लालटेन
और वापस लौटने की मजबूरी
सामने है

हर दृश्य से क्यों लौटना होता है
जानता नहीं अभी
लौट कर जब जाऊँगा
हवा का रंग देख कर चख कर जंगल का स्वाद
सूंघ कर वन-इच्छाओं की गंध
क्या ले जाऊँगा साथ
क्या कहूँगा मित्रों से

दुनिया की
जिसे कुछ घंटे पीछे छोड़ गया था कैसी होगी शक्ल
क्या साथ ले जा सकते हैं हम
यहां से अद्भुत संस्मरण केवल या पूरे नौ सौ साल

ये पत्थर या सोचते हैं हमारे बारे में
नीलगायों की प्यास को ले कर
तालाब की धारणा क्या है
झड़बेरियों के पुष्प बिना प्रयास फूटते हैं
वे ही यहां सबसे ज्यादा वाचाल हैं
सबसे ज्यादा लाल

झींगुर अविराम बातें कर रहे हैं
और पेड़ों पर रिस रहा है अंधकार
खरबूजे की कटी हुई फाँक की याद दिलाता
चन्द्रमा उदित हुआ चाहता है

बस कुछ ही क्षण और कुछ ही देर में
यह कविता खत्म हो जाएगी
बिना उपसंहार

Leave a Reply