घर लौटना

वहां तक जहां तक मैं सुन सकता हूँ अपने आप को
एक सबोधन की तरह मैं कविता का पीछा करूंगा

उसमें मेरी माँ होगी जैंसे कोई पुरानी हस्तलिपि
जिसे बरसों पहले ली गई तस्वीर में सही तरह पहचानने में
संभवतः मुझे याददाश्त पर जोर डालना पड़े
साइकिलों पर चढ़ कर मेला देखने जाते कुछ बच्चे भी होंगे
परिस्थितिवश जिनका बचपन अलग-अलग मकानों में गुजरा
गर्मियों की वे उमस भरी शामें गिरती हुई मच्छरदानियां
जन्मदिन और मौसम के पहले अरस का जायका
हैंगरों पर होंगी चैड़े पाँयचों वाली जा चुके फैशन की पतलूनें
रास्ते में खोया होगा एक नया ज्याॅमैट्री बक्स
होगा सदैव की तरह स्थिर कोई शिव-मंदिर प्राचीन
सिर्फ किराएदारों के ही लगातार उपयोग में आने वाला आंवले का पेड़
होंगे बहुत से मोर क्रंदन में जिनके भीतर डबडबा रही होगी
एक अदृश्य करुणाजनक लौ . . .
संभव है वे याद दिलाने में सफल हो जाएँ एक समूचा बचपन और
हमें देखने को मिलें भूरे रंग के कुछ पुराने ग्रुप फोटो
गंध रंग और आवाजें
पर यह भी संभव है आप ही में से कुछ लोग कहें
रास्ता यहाँ से नहीं है मित्र

किन्तु मुझे पता है
कविता कब आपके भीतर से एक झरने की सूरत में फूटती है
और तकलीफें कैसी शब्दों में तब्दील होना शुरू हो जाती है
इसलिए मित्रो
मैं थकूँगा नहीं न अचकचाऊंगा
फिर सुनूंगा वाक्यविन्यास में गूंज रही अपनी पदचाप

मैं भूलूंगा और
बार-बार याद आऊंगा खुद को
अंततः मैं जान ही जाऊंगा
अपने घर का रास्ता: कविता का घर
जहां खत्म होते हैं जहां से सारे सपने
समय और समाज

तो कुछ इस तरह मित्रो
एक बार फिर
मैं कोई कविता लिखूंगा

Leave a Reply