नौ बजे की कविता

एक और दिन है यह

नाखून की सूरत में
मेरी उंगली पर उगता हुआ
मैं
इसे जानता हूँ
यह कहना शायद सही नहीं
दिन अगर नाखून है
तो
इसका कटना भी
उतना ही निश्चित
जितनी इसकी नोंक
दिन के नौ बजे

कमेडि़यां बगीचों में मशगूल हैं
एक बच्चा सड़क पार कर रहा है
एक अरथी गुजर रही है
एक मास्टर कक्षा में उकता रहा है
बघार लगा रही है
पत्नी रसोईघर में

वही दाल किसी भी रसोई में किसी भी पत्नी की हो सकती है

भारतवर्ष की घडि़यों में
दिन के नौ बज रहे हैं

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