रुकना न पथिक….

रुकना  न पथिक

शूल रक्त राह हो या घोर अन्धकार  हो

काल तम की विनाशकारी चल पड़ी बयार हो

चाहे  शेषनाग   की प्रय्लान्कारी  फुंकार  हो

या किसी से   विरह   की वेदना   की पुकार  हो

अश्रु  छूटे सांस  टूटे  रूठा  सारा संसार  हो

बलिदान  तुमसे  मांगता  यदपि  यह  प्यार  हो

परशुराम का फरसा बरसा रहा कुठार हो

मनुष्यता बाँझ बन कर रही तकरार हो

रुष्ट हो अधीर बन भाग्य की मार हो

गला  हो रूंधा और जल की खार हो

हो बेला  मिलन  की और बीच में दीवार हो

यौवन के पाँव में बाजारू पायल की झंकार हो

आशा किरण बोझिल बन कर रही  पुकार हो

पर सदैव याद तुम्हे गीता का सार हो

……रुकना  न पथिक पुकारता तुम्हे तुम्हारा लक्ष्य है

                                                                —————- शिवेंद्र

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