आज भी …..

जिन राहों पर कभी  मेहके थे भीगे गजरे

शोख हुईं थीं तुम्हारी अदाएं मचलकर

जुड़ीं थीं दो रूह  इबादत में मोहब्बत की

पाकीज़ा हुई थीं जहां वफायें संभलकर…..

पड़े हैं वे चाहत के फूल वहां  आज भी…

सदायें आ रहीं हैं उन राहों से आज भी…

सूरज उगा गयी थी जो सुबह तुम्हारे माथे पर

पुकारा  था साथ जिस पपीहे को हमने छिपकर

चूमा था जिन आवारा लहरों ने तुम्हारा आँचल

खोये थे ख्वाबों  के  ऐश गाह में  हम घिरकर

प्यासा है वो पपीहा वहां आज भी….

लहरें बिसर रही हैं  सूनी वहां आज भी….

उड़ा कर पन्नों को छू गयी थी  जो कमसिन हवा

और महकी थी हिना जब सावन के झूलों  पर

तुम्हारे बदन पर खिला कर फाल्गुन का  इन्द्रधनुष

हम दोनों  बहके थे महुआ के फूलों पर

तन्हा पड़ा है प्यासा झूला वहां आज भी…..

 बेरंग है वो  फाल्गुन वहां आज भी…..

                                                                                                                        ….शिवेंद्र

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