खानाबदोश

हम तो  हैं खानाबदोश,अपने लिए

अपना क्या बेगाना क्या..

किस्से क्या फ़साना क्या….

सुबह हुई पनघट पर अपनी

सोना क्या बिछाना क्या….

अंगडाई झरनों पर तोड़ी

ऊँघना क्या उठाना क्या….

आँख मली किरणों ने अपनी

लरजना क्या अलसाना क्या..

गोदी में वसुधा की बैठ कर

दौलत क्या खजाना क्या…

हम तो  हैं खानाबदोश.अपने लिए

अपना क्या बेगाना क्या…

किस्से क्या फ़साना क्या….

पथ की मिटटी बदन पर मल ली

साबुन क्या नहाना क्या….

कुदरत के दो फूल चख लिए

थाल क्या सजाना क्या…..

ऋतुओं की माला पहन ली

सौंदर्य क्या दिखाना क्या..

सावन बना मदिरालय अपना

पीना क्या पिलाना क्या…..

हम तो  हैं खानाबदोश.अपने लिए

अपना क्या बेगाना क्या

किस्से क्या फ़साना क्या

धूप रूप से यारी  अपनी

तपना क्या जलाना क्या….

नंगे पैरों की सवारी अपनी

थकना क्या बहाना क्या…

सांझ की बेला दुल्हन अपनी

रूठना क्या मनाना क्या..

आकाश की चादर तानी हमने

बिस्तर क्या आशियाना क्या….

हम तो  हैं खानाबदोश.अपने लिए

अपना क्या बेगाना क्या

किस्से क्या फ़साना क्या

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