यह बात तुम हमसे ना पूछो ……..

कांच की हरी चूड़ियों से लिपटी
सावन के मेले की वह रातरानी
मौसम को सुहागिन कर गयी जिसकी हंसी
जैसे कमल पर पहली ओस का पानी
वह हंसी सलमा की थी या राधा की
वह मौसम रमजानी था या बासंती
यह बात तुम हमसे ना पूछो
कटीली पगडंडियों पर चलते हुए
पीपल के बिछौने के बीच
सूखे कंठ को गीला  कर गया था किसी का जल
उस पात्र का स्वामी उंच था या नीच
यह बात तुम हमसे ना पूछो
तलाशते हुए अपनी खोई हुई मंजिल को
हम भटके थे कई बार इन अगम राहों पर
चिराग जलाई थी  जिस आत्मा की मशाल ने
और राह दिखाई थी जिसने खुद को जलाकर
वह राम था या रहमान
वह कबीर था या कृष्ण
यह बात तुम हमसे ना पूछो….

Leave a Reply