देवताओं का व्रत

बुद्ध, राम, कृष्ण, मोहम्मद और ईशा को ,
अभी   एक व्रत धरना है ,
मानव कल्याण के लिए ,
उन्हें  अभी अनंत कार्य करना है ,
अभी तो आदिम व्यव्हार भी नहीं गया है ,
और दावा सभ्यता का है ,
इस सर्वव्याप्त अन्धकार को,
देवताओ को ही नष्ट करना है,
अज्ञान की इस अविरल धरा का मुख ,
मनुष्य तो नहीं मोड़े सकता ,
मनुष्य तो अभी निज स्वार्थ  भी नहीं छोड़ सकता ,
पूर्णमाशी का चितेरा ,
अमावश में घबराता है ,
यदि इस विश्रांत,अविवेकी को  बचाना है,
तो स्वयं देवताओ को ही स्वर्ग ,
छोड़कर प्रथ्वी पर आना है,
क्योकि जबतक समूची प्रथ्वी पर जन कल्याण की थोथी उद्घोश्नाये होती रहेंगी ,
मानवता लाचारी  के खुनी अंशु रोती रहेगी.

अरुण त्यागी /दिल्ली/२८/०४/२०१२

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