मैंने सोचा न था

मैंने सोचा न था मयखाने में आने पर इतना बवाल होगा
हर तरफ उंगलिया उठेंगी हर तरफ एक सवाल होगा
दुनिया कितनी जालिम है जिन्दगी को जिन्दगी से दूर कर रहे है
मयखाने पर सवाल उठा कर बहुत बड़ी भूल कर रहे है
पीने को मेरे पीना न कहो जीने की जरुरत है  पीना
जाम को वो क्या जानेगे  जो जान न पाए अब तक जीना
मयखाने में जाने का शौक नहीं है मुझको
जाम से जाम लड़ाने का शौक नहीं है मुझको
शौक है गम भुलाने का दिल का दर्द मिटाने का
जख्मो पर मरहम लगाने का दुःख पाकर भी मुस्काने का
जब जाम ये अंदर जाता है एक अजीब शुकून सा आता है
बेदर्द जमाना क्या जानेगा हर दर्द ये जाम भूलता है
हर दर्द ये जाम भूलता है ।

 

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लोकेश उपाध्याय

+255 682592591

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