पंथ होने दो अपिरिचत

पंथ होने दो अपिरिचत

प्राण रहने दो अकेला!

 

और होंगे चरण हारे,

अन्य हैं जो लौटते दे शूल को संकल्प सारे;

दुखव्रती निर्माण-उन्मद

यह अमरता नापते पद;

बाँध देंगे अंक-संसृति से तिमर में स्वर्ण बेला!

 

दूसरी होगी कहानी

शून्य में जिसके मिटे स्वर, धूलि में खोई निशानी;

आज जिसपर प्यार विस्मित,

मैं लगाती चल रही नित,

मोतियों की हाट औ, चिनगारियों का एक मेला!

 

हास का मधु-दूत भेजो,

रोष की भ्रूभंगिमा पतझार को चाहे सहेजो;

ले मिलेगा उर अचंचल

वेदना-जल स्वप्न-शतदल,

जान लो, वह मिलन-एकाकी विरह में है दुकेला!

 

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  1. dr neeraj 21/01/2013

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