भारी घोड़सारन तलावन तिलाक लिख्यो

भारी घोड़सारन तलावन तिलाक लिख्यो ,
गड़िगे अकब्बर बहुरि नाहीँ बहुरे ।
ताके कवि बीरवर तृन सम गुन्यो नाहिँ ,
ऎसेहू न भये कलि कर्ण हू ते लहुरे ।
लछमी कहति सब सूमन ते बार बार ,
देहु लेहु खरचहु मोको जनि गहुरे ।
ब्याही के न सँग रहौँ तीन लोक प्रभु जौन ,
काल के चिन्हारे लोग मोसे कहैँ रहुरे ।

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