माना कि तकदीर हमारी भारी है

माना कि तकदीर हमारी भारी है

कर ली लेकिन लड़ने की तैयारी है

जिसने दिल को जीता उससे जग हारा

दिल की सुनना ही तो इक बीमारी है

दिल को वश में करके आलिम पीरों ने

अकसर ही जीने की राह सुधारी है

दुनिया में सब मुफ़लिस को तड़पाते हैं

वो ही ऊपर जा कर पाए सवारी है

दौलत की या मौला की नौकरी करें

ये मर्ज़ी तो केवल ख़लिश हमारी है.

महेश चन्द्र गुप्त ’ख़लिश’

४ मई २०१२

 

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