आज सोमवार है

साथ

उस चमक का

जो पहली मुलाकात पर ही

                भर गयी निगाहों में

हुलास

उस पतवार का

जिसने मझधार में डगमगाती नइया को

                       लगाया पार

प्रकाश

उस किरण का

जो अँधेरे के खिलाफ

                    फूटी पहली बार

आस्वाद

उस हवा का

जो ऐन दम घुटने से पहले

               पहुँच गयी फेफड़ों में

विश्वाश

उस स्वप्न का जो नींद टूटने के बाद

             भी बना रहा आँखों में

सबकुछ

शामिल है मेरी टूटी बिखरी नींद में

मेरी नींद जहाँ स्वप्न मंगलमय हैं और

                 आज सोमवार है।

 

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