रहेंगे  दिल में ये समझा था वो ख़ुशी बनकर

                ग़ज़ल
रहेंगे दिल में ये समझा था वो ख़ुशी बनकर
मिटा रहे है वही मुझको ज़िन्दगी  बनकर

वो मेरे ज़िस्म के अन्दर है जिंदगी की तरह
ग़ज़ल की रूह में रहता है शायरी बनकर

तमाम  उम्र समझता  रहा  जिसे  अपना
गया जो वक़्त गए वो भी अज़नबी बनकर

वो जिसके दम से ज़माने में ये उजाला है
उसी का नूर है इस दिल में रौशनी बनकर

मै रोज खिड़की से तकता हूँ  आसमानों को
कभी दिखे वो अंधेरों   में  चांदनी बनकर

न इनको तोड़ के फेंको गली में कूंचों में
ये बेटियां हैं इन्हें खिलने दो कली बनकर 

“रज़ा”ख़ुदा से यही मांगता हूँ दिल से दुआ
की मै भी जी लू ज़माने में आदमी बनकर
GAZAL by
Shayar salimraza rewa 9981728122