मन पाखी

मन तुम तो पाखी बन कर

उड़ जाते हो दूर गगन तक

पल भर में ही हो आते हो

सात समुन्दर पार तक।

 

पल में यहां और पल में वहां

हर क्षण जगह बदलते हो

क्या कोई तुम्हारा एक ठिकाना

बना नहीं है अब तक।

 

हर पल तुम तो विचरा करते

चैन न लेने देते हो

जैसे भटकता कोई राही

मिले न मंजिल जब तक।

 

सोचूं तुमको बंधन में बांधूं

पर कैसे और कहां तक

तुम ऐसे परवाज़ हो जिसको

बांध सका ना कोई अब तक।

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कवियत्री–पूनम  श्रीवास्तव

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