धनि वै जिन प्रेम सने पिय के उर मे रस बीजन बोवती हैँ

धनि वै जिन प्रेम सने पिय के उर मे रस बीजन बोवती हैँ ।
धनि वै जिन पावस मे पिसिकै मेँहदी कर कँज मलोवती हैँ ।
धनि वै जिन सूरत साजि सजै हम लाज कै बोझ को ढोवती हैँ ।
धनि वै धनि सावन की रतियाँ पति की छतियाँ लगि सोवती हैँ ।

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