जुस्तजू जिसकी थी उस को तो न पाया हमने

जुस्तजू जिसकी थी उस को तो न पाया हमने
इस बहाने से मगर देख ली दुनिया हमने

तुझको रुसवा न किया ख़्हुद भी पशेमाँ न हुये
इश्क़ की रस्म को इस तरह निभाया हमने

कब मिली थी कहाँ बिछड़ी थी हमें याद नहीं
ज़िंदगी तुझको तो बस ख़्ह्वाब में देखा हमने

ऐ ‘आद’ और सुनाये भी तो क्या हाल अपना
उम्र का लम्बा सफ़र तय किया तनहा हमने

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