धूप छाँव

कई दिन बाद

वो हँस कर बोले

उनकी हँसी

कितनी देर रहेगी

कब मुंह लटका कर

बैठ जायेंगे

आंसू बहाने लगेंगे

इस डर से उनके साथ

हँस नहीं सका

उनका धूप छाँव सा

हँसना रुलाना

अब सह नहीं पाता

हँसना चाहूँ उससे

पहले ही रोना पड़ता

पर उनका मोह मुझे

उनसे दूर भी नहीं होने देता

गलती उनकी नहीं है ,

इसलिए सह रहा हूँ

लोगों ने इतना रुलाया उनको

कि हँसना ही भूल गए थे

रोना,रुलाना,नाराज़ होना ही

जीने का तरीका बन गया

बहुत समझाने के बाद

कभी कभी हँसने तो लगे हैं

जिस दिन निराशा से

मुक्त हो जायेंगे

हँसना उनके जीवन का

तरीका बन जाएगा

मैं भी मन से

उस दिन ही हँस पाऊंगा

 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

05-05-2012
498-13-05-12

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