प्रेम तकलीफदेह है ….

जहां समाप्ति की नियति है

वहां हर कर्म क्षणिक और

अपने लिए गढ़ा गया हर अभिप्राय भ्रम होता है

इसलिए-

शुरू की जानी चाहिए मृत्यु से

जीवन की बात

समझना चाहिए

ज़िंदगी को एक छोटा सा सफ़र

बगैर भ्रम को पाले हुए जीना हो तो…..

.

यदि मन में यह विश्वास उग सके कि

हर किसी को उतर जाना है

देर-सवेर

तो फिर यही रह जाता है न कि

जीतनी देर बैठें –

दूसरों के दु:ख -दर्द बांटने का सिलसिला जारी रखें …

उन्हें स्नेह देते रहें और करते रहें प्यार ….!

.

यही है जीवन का आधार

कहती थी धनपतिया

जब एकांत क्षणों में होती थी पास मेरे

.

आज नहीं है मेरे सामने वह , मगर-

साथ है उसके द्वारा दिए गए शब्दों का वह उपहार जो –

आखिरी मुलाक़ात के साथ दे गयी थी मुझे

भावनाओं की पोटली में बांधकर , कि-

” बाबू !
प्रेम तकलीफदेह  है …..पर आदमी बनने के लिए
जरुरी है तकलीफ से गुजरना ….!”

() रवीन्द्र प्रभात

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