सोच यह विकसित करें

ग़ज़ल 

आईये हम मुल्क में सोच यह विकसित करें
एक व्यक्ति एक को हर रोज हीं शिक्षित करे ।
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नौजवां के हाथ में केवल नहीं हो डिग्रियां-
नई सुबह हो सामने आज यह निश्चित करें ।
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मुल्क जितना तुलसी का उतना ही रसखान का-
गली-मुहल्लों में यही बस भावना सिंचित करें ।
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सच में जीना चाहते गांधी के आदर्श को –
वेकशों का इसकदर मन- प्राण न कुंठित करें ।

() रवीन्द्र प्रभात

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