किसकी रोएं, किसकी गाएं बाबू जी ।

(ग़ज़ल )
पटाखे फोड़कर क्यूं नोट जलाएं बाबू जी
मिटटी के दीयों से घर सजाएं बाबू जी ।
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हमारे गाँव की पगडंडियाँ मासूम है-
इसे न राजपथ से आप मिलाएं बाबू जी ।
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दिखाबों के भयाबह से हमें लगता है डर-
मुआं मंहगाई यह आंसू रुलाए बाबू जी ।
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गरीबों को मिले दो जून की रोटी बहुत है-
उन्हें बस आप कर्जों से बचाएं बाबू जी ।
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जहां पर टूटते संबंध प्यालों की तरह-
वहां हम किसकी रोएं, किसकी गाएं बाबू जी ।
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प्रभात के किस्से सुनाये स्याह पन्नों पर-
ऐसे हमदर्द को ना आजमाएं बाबू जी ।
() रवीन्द्र प्रभात

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