मैं बारिश और बयार है वह ।

(ग़ज़ल )

बड़ा ज़िद्दी बड़ा निडर बड़ा खुद्दार है वह
इसलिए शायद अलग-थलग इसपार है वह ।

रात को दिन और दिन को रात कैसे कहे-
यार जब राजनेता नहीं फनकार है वह ।

उसे इन मील के पत्थरों से क्या मतलब-
सफ़र के लिए हर बक्त जब तैयार है वह ।

क्यूँ डराते हो जंग से बार -बार उसको –
खुद जब अपने साये से बेजार है वह ।

कोई रिश्ता नहीं उससे मेरा “प्रभात”
पर लगता मैं बारिश और बयार है वह ।

() रवीन्द्र प्रभात

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