कहाँ गए नलकूप

दोहे 
पहले ओला गिर गया, गडमड पैदावार !
कैसी गर्मी बेशरम,     आयी है इसबार !!
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झुरमुट-झुरमुट झांकता, रात में नन्हा चाँद !
पर ज्यों-ज्यों दिन चढ़ रहा, बढ़ा रहा अवसाद!!
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धूप चढी आकाश में,    मन में ले उपहास !
पानी-पानी कर गयी , रेगिस्तानी पियास !!
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लहर-लहर के लोल पर, ललकी-ललकी धूप !
नदी पियासी ढूंढ रही,        कहाँ गए नलकूप !!
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कान्हा – कान्हा ढूँढती , ताक- झाँक के आज ।
कौन बचाएगा यहाँ, पांचाली की लाज । ।
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गिद्ध – गोमायु- बाज में, राम-नाम की होड़ ।
मरघट-मरघट घूमते, तोते आदमखोर । ।
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कातिल – कातिल ढूंढ के ,    मुद्दई करे गुहार ।
मोल-तोल में व्यस्त हैं, मुंसिफ औ सरकार। ।
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राग- भैरवी छेड़ गए,           कैसा बे – आवाज़ ।
उछल-कूद कर मंच मिला ,बन बैठे कविराज । ।
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घर- घर बांचे शायरी , शायर-संत – फ़कीर ।
भारत देश महान है , सब तुलसी सब मीर । ।
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राजनीति के आंगने ,         परेशान भगवान ।
नेत- धरम सब छोड़ के , पंडित भयो महान । ।
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हंस-हँस कहती धूप से , परबत-पीर-प्रमाद ।
बहकी – बहकी आंच दे , पिघला दे अवसाद । ।
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यौवन की दहलीज पे, गणिका बांचे काम ।
बगूला- गिद्ध- गोमायु सब, साथ बिताये शाम । ।
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नदी पियासी देख के , ना बरसे अब मेह ।
धड़कन की अनुगूंज से , बादल बना विदेह । ।
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लूट रही मंहगाई,             आकरके बाज़ार !
मौसम सी बदली हुयी, दिखती है सरकार !!
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निर्वाचन के घाट पे , भई नेतन की भीड़ !
जनता बन गयी द्रौपदी , खींच रहे हैं चीर !!
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गदहा गाये भैरवी , तनिक न लागै लाज !
शाकाहारी बन गए , गिद्ध -गोमायु -बाज !!
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पक्ष और प्रतिपक्ष में, ढूंढ रहे सब खोंच !
पांच बरस तक चोंचले, खूब लड़ाए चोंच !!
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हरियाली की बात करे , सूख गए जब पात !
जनता भोली देखती ,      नेता का उत्पात !!
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कृष्ण-दु:शासन साथ हैं , अर्जुन बेपरवाह !
कोई मसीहा आये,     दिखलाये अब राह !!
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तन पे सांकल फागुनी, नेह लुटाये मीत !
पके आम सा मन हुआ , रची पान सी प्रीत !!
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महुआ पीकर मस्त है, रंग भरी मुस्कान !
झूम रहे हैं आँगने, बूढे और जवान !!
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धुप चढी आकाश में , मन में ले उपहास !
पानी-पानी कर गयी , बासंती एहसास !!
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चूनर- चूनर टांकती , हिला-हिला के पाँव !
शहर से चलकर आया, जबसे साजन गाँव !!
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मंगलमय हो आपको , होली का त्यौहार !
रसभीनी शुभकामना, मेरी बारम्बार !!
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मह- मह करती चांदनी , सूख गए जब पात ।
रात नुमाईश कर गयी , कैसे हँसे प्रभात । ।


() रवीन्द्र प्रभात

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