बन रही तल्खियाँ , बेटियाँ ।

ग़ज़ल  

बेटियाँ , बेटियाँ , बेटियाँ
बन रही तल्खियाँ , बेटियाँ ।

सुन के अभ्यस्त होती रही,
रात – दिन गलियाँ , बेटियाँ ।

सच तो ये है कि तंदूर में ,
जल रही रोटियाँ , बेटियाँ ।

घूमती है बला रात- भर,
बंद कर खिड़कियाँ , बेटियाँ ।

कौन कान्हा बचाएगा अब,
लग रही बोलियाँ , बेटियाँ ।

रवीन्द्र प्रभात 

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