तुम लौट आना अपने गांव

कविता

जब झूमें घटा घनघोर
और टूटकर बरस जाये
तुम लौट आना अपने गांव
अलाप लेते हुये धानरोपनी गीतों का
कि थ्रेसर – ट्रेक्टर के पीछे खडे बैल
तुम्हारा इन्तजार करते मिलेंगे
कि खेतों में दालानों में मिलेंगे
पेंड़ होने के लिए करवट लेते बीज
अमृत लुटाती –
बागमती की मन्द- मन्द मुस्कराहट
माटी में लोटा-लोटाकर
मौसम की मानिंद
जवान होती लडकियां
पनपियायी लेकर प्रतीक्षारत घरनी
और गाते हुये नंग- धरंग बच्चे
” काल- कलवती-पीअर -धोती
मेघा सारे पानी दे …. ।”
.
जब किसी की कोमल आहट पाकर
मन का पोर – पोर झनझना जाये
और डराने लगे स्वप्न
तुम लौट आना अपने गांव
कि नहीं मिलेंगे मायानगरी में
झाल- मजीरा / गीत- जोगीरा / सारंगा –
सदाबरीक्ष/ सोरठी- बिरज़ाभार / आल्हा –
उदल / कज़री आदि की गूँज
मिलेंगे तो बस –
भीड़ में गायव होते आदमी
गायब होती परम्पराएं
पॉप की धून पर
संगीत के नए- नए प्रयोग
हाथ का एकतारा छोड़कर
बंदूक उठा लेने को आतुर लोकगायक
वातानुकुलित कक्ष में बैठकर
मेघ का वर्णन करते कालीदास
और बाबा तुलसी गाते हुये
” चुम्मा-चुम्मा ……. ।”
.

तुम लौट आना अपने गांव
कि जैसे लौट आते हैं पंछी
अपने घोसले में
गोधूलि के वक़्त
मालिक के भय से / महाजन की धमकी से
बनिए के तकादों से
कब तक भागोगे
कि नहीं छोड़ते पंछी अपना डाल
घोंसला गिर जाने के बावजूद भी ……. ।

तुम लौट आना अपने गांव
कि तुम्हारे भी लौटेंगे सुख के दिन
अनवरत जूझने के बाद
कि तुम भी करोगे अपनी अस्मिता की रक्षा
सदियों तक निर्विकार
जारी रखोगे लडाई
आखरी समय तक
मुस्तैद रहोगे हर मोर्चे पर
किसी न किसी
बेवास- लाचार की आंखों में
पुतलियों के नीचे रक्तिम रेखा बनकर……. ।
.

तुम लौट आना अपने गांव
कि नहीं छोड़ती चीटियां
पहाडों पर चढ़ना
दम तोड़ने की हद तक ।
() रवीन्द्र प्रभात 

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