आज फिर…

कविता 

आज फिर-
धर्ममद का अग्निकांड
दरका गया छाती
और लोगों की फूहड़ गालियों से
निस्तब्ध हो गयी परिस्थितियाँ !
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आज फिर –
उद्घाटित हुई
सदाचार की नयी भूमिकाएं
शोक-सन्देश प्रसारित कर
जताई गयी सहानुभूति
चूहे की मृत्यु पर !

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आज फिर-
दूरदर्शन की उजली पृष्ठभूमि पर
प्रतिबिंबित हुई
दंगे की त्रासदी / कर्फ्यू का सन्नाटा
विधवाओं की सुनी मांग
और, अनाथ बच्चों का करुण-क्रंदन !
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आज फिर-
उजड़े छप्परों के नीचे
पूरी रात चैन से नहीं सोया
वह भूखा बीमार बच्चा
सूनसान शहर की सपाट सड़क पर
सायरन वाली गाड़ियों को देखता रहा रात-भर !

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आज फिर-
ढाही गयी सभ्यता की दीवार
उमड़ आया सैलाब अचानक
उस बूढ़े स्वतन्त्रता सेनानी की आँखों में
और फूट पड़े होठों से ये शब्द-
” शायद उस दिन देश का दुर्भाग्य मुस्कुराया था
जब हमने लहू से सींचकर
स्वतन्त्रता का कल्पवृक्ष उगाया था !”

रवीन्द्र प्रभात 

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