फ़िर नही कोई बहाना चाहिए

ग़ज़ल 

अनुभवों का फ़िर नही कोई बहाना चाहिए ,
सोच जिसमें है नई वह आजमाना चाहिए ।
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थक गए हैं जो सफर में दीजिये आराम उनको-
एक इंजन जोश से लबरेज आना चाहिए ।
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बेवजह ही ढूँढते हो खोट गमलों में मियाँ-
झुक गयी है पौध उसको एक निवाला चाहिए ।
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घर में आकर जो हमारे दे गए बेचैनियाँ-
उस पड़ोसी से हमें दूरी बनाना चाहिए ।
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जल रहा है जो परिंदा चीख कर यह कह रहा –
रोशनी से इस कदर ना यूँ नहाना चाहिए।
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देश को अब चाहिए खुशनुमा सा इक प्रभात-
जिसके पीछे चल सके पूरा ज़माना चाहिए ।

रवीन्द्र प्रभात 

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