छेडिए इक जंग…

ग़ज़ल 
खेलिए ज़ज़्बात से मत खौफ़ तारी कीजिये
मुस्करा के वेबजह ना  मेहरबानी  कीजिये
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छेडिये इक जंग ग़ुरबत को मिटाने के लिए
घोषणा मत खोखली या मुँह जबानी कीजिये
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कौन है जो चांदनी का नूर फैलाता है अब
सोचिये कुछ सोचिये कुछ मगजमारी कीजिये
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आइये , भरिये जहां में उल्फतें ही उल्फतें
हर किसी से बात खुल कर प्यारी-प्यारी कीजिये
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बैठे – बैठे प्यास का मसअला होगा न हल-
बात तब है , पत्थरों में नहर ज़ारी कीजिये
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राम औ रहमान दोनो हैं अलग कहके प्रभात
देश की आवाम को न पानी – पानी कीजिये
रवीन्द्र प्रभात 

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