कैँधौँ दृग सागर के आस पास स्यामताई

कैँधौँ दृग सागर के आस पास स्यामताई ,
ताही के ये अँकुर उलहि दुति बाढ़े हैँ ।
कैँधौँ प्रेम क्यारी जुग ताके ये चँहूधा रची ,
नील मनि सरन कौ बारि दुख डाढ़े हैँ ।
मूरति सुकवि तरुनी की बरुनी न होवे ,
मेरे मन आवे ये विचार चित गाढ़े हैँ ।
जेईजे निहारे मन तिनके परिकिबे को ,
देखो इन नैन हजार हाथ काढ़े हैँ ।

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